अंबेडकर जयंती पर उनकी लिखी किसी पुस्तक से कोई उद्धरण दे देना या उनके किसी संबोधन से कुछ पंक्तियाँ उद्धृत करना न तो मुझे पसंद ही है न ही मैं अंबेडकर को आनुष्ठानिक श्रद्धांजलि देने का पक्षधर हूं। स्मृति में जो है, जितना है और जैसा है वही आपसे शेयर कर रहा हूँ। उनके जीवन संघर्ष के बारे में अब ज़्यादातर बातें आम हैं। मैं उन्हें स्वातंत्र्य वेला के उन विरले व्यक्तित्वों में गिनता हूँ जो अत्यंत मेधावी और शिक्षित थे। इस क्षेत्र में उनके समकक्ष एक-दो ही और नेता होंगे। कम से कम गांधी जी, नेहरू आदि की तुलना में तो उनका अध्ययन कहीं अधिक गहन, व्यापक और गवेषणापूर्ण था। भारत की राजनीति में उनकी व्यक्तिगत उपस्थिति कांग्रेस,कम्युनिस्ट या मुस्लिम लीग की तरह महत्वपूर्ण तो नहीं थी। लेकिन उन दिनों शायद सबको साथ लेकर चलना देश के सुनिश्चित विकास की नींव रखने के लिए ज़रूरी था। सो कांग्रेस की सरकार होते हुए भी कांग्रेस से इतर भी अनेक महत्वपूर्ण लोगों को साथ लेकर चलने की कोशिश की गई थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ग़ैर कांग्रेसी होते हुए भी शासन से जोड़े गए। अंबेडकर को साथ में लेकर चलना तो कांग्रेस की और भी बड़ी मजबूरी थी।अंबेडकर जिस विशाल सामाजिक संस्तर के प्रत्यक्ष अथवा भावनात्मक ऐक्य को मूर्तिमान कर रहे थे,जिनका वे नेतृत्व और प्रतिनिधित्व कर रहे थे,उसके चलते उनकी उपेक्षा करना संभव ही नहीं था। लिहाजा संविधान के प्रारूप निर्धारण से उन्हें जोड़ना इसी गुणा-भाग का परिणाम हो सकता है। अंबेडकर शिक्षा की दृष्टि से ही नहीं बल्कि अपनी तर्कों और तथ्यों के बल पर भी गांधी जैसे लोकप्रिय नेताओं को कई बार निरुत्तर कर चुके थे। गांधी जी उदार हिंदू व्यवस्था में दलितों (उस काल की भाषा में कहें तो अछूतों और बाद में हरिजनों) के लिए कुछ सम्मान और बराबरी की बात पर ज़ोर देते थे और अपनी इस प्रस्थापना के कारण गांधी जी स्वयं को अछूतों का मसीहा सिद्ध करना चाहते थे। बाज़ार पर उन दिनों लगभग पूरी तरह कांग्रेस का क़ब्ज़ा था, सो आमतौर पर यह विचार खूब बिका भी और ज़्यादातर हिंदुस्तानी गांधी जी को अछूतों का उद्धारक मानने भी लगे थे। अंबेडकर ने गांधी जी के इस प्रयास को पूरी तरह निरर्थक और मिथ्या बहलाने वाला सिद्ध कर दिया। उन्होंने गांधी जी से स्पष्ट कहा कि ये सब कसरत करने से बेहतर है कि आप कांग्रेस के सदस्यों के लिए यह अनिवार्य कर दें कि उन्हें सप्ताह में कम से कम एक दिन अछूतों के साथ भोजन करना होगा। अपने घरों में अछूतों को काम पर रखना होगा और उनसे बराबरी के सामाजिक संबंध बनाने होंगे। सभी जानते हैं राजनीति खोखली शब्दावलियों के सहारे ही आगे बढ़ती है। अंबेडकर की बातें भी गांधी जी को रास नहीं आईं, और वे अपनी तथाकथित अछूतोद्धार की योजना की ब्रांडिंग में ही व्यस्त रहे।
सत्ता हस्तांतरण के साठ-सत्तर वर्षों के बाद भारत का दलित समाज अब इतना सचेत तो हो ही चुका है कि अब उनके शलाकापुरुष का राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि के अपहरण किया जाना उसे स्वीकार्य नहीं है। दलितों के पास अब अपने नायकों की लंबी श्रृंखला है। साहित्य, संस्कृति आदि के क्षेत्रों में भी अनवरत कार्य हुआ है। अब उन्हें स्वयं को अछूत या हरिजन कहलाना पसंद नहीं है। बल्कि वे अपने आपको दलित कहलवाना पसंद करते हैं। इस शब्द में उन्हें आक्रोश और यथास्थिति के प्रति असंतोष का भाव अधिक महसूस होता है। इसी राजनीतिक चेतना और सजगता के चलते भारत के दलित समाज ने अंबेडकर की पहचान शासक दल के साथ नहीं होने दी। दरअसल ये चेतना ही भारत के समाज और राजनीति में अंबेडकर की अमूर्त्त उपस्थिति है। शायद इसी चेतना के अभाव में अंबेडकर बार-बार अपने लोगों पर खीझ भी उठते थे। भारत के दलितों में आत्मगौरव का अहसास भरने और इतिहास में दलितों की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करने के लिए अंबेडकर ने अनथक प्रयत्न किया। अंबेडकर के योद्धा अब अपने नायक के संकल्प के अनुरूप तैयार हो रहे हैं। अब उन्हें बहलाना असंभव है,उन्हें मंदिरों में प्रवेश करने देना या फिर पुजारी आदि बना देना पूर्णतः निर्रथक लगता है। उनके साथ फ़ोटो खिंचवा लेना या फिर प्रदर्शन के लिए उनके घर जाकर उनके साथ भोजनादि करने की नौटंकी भी फ़िज़ूल है। दलितों को अब अपना लक्ष्य स्पष्ट नज़र आ रहा है और यही अंबेडकर का सपना था। हालांकि अभी उनका ख़ून गर्म होना शुरू हुआ है, इसे खौलने में कुछ और वक्त लगेगा। बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर के सपनों को साकार करने के लिए जिस स्तर का आक्रोश और आत्माहुति का जज़्बा जरूरी है, वो तो अभी बहुत दूर की बात लगती है। वरना जिन पुस्तकों में दलितों के लिए अपमानजनक शब्द लिखे हों उन पुस्तकों का रोज़ाना होली जलाई जाती। जिन तथाकथित दिव्य लोगों ने सदियों तक उनके पूर्वजों को अपमानित किया उनकी संतानें आज खुद को हर जगह असुरक्षित महसूस करतीं। जो लोग स्तन कर(breast tax),देवदासी या फिर स्थानीय गांवों तक में दलितों की स्त्रियों को विवाहोपरांत पति से पहले भोगने की 'पवित्र परंपराओं' पर चलते रहे आज उनके परिवारों में वैसी ही स्थिति का भय होता। भारत के सभी मंदिर,सभी भगवान मुख्यतः दलितों द्वारा ही निर्मित हैं। दलितों को आज भी ये भान नहीं है कि सभी मंदिरों, भगवानों और चढ़ावे के वे ही अधिकारी हैं। इन्हें बनाए रखने या ध्वस्त करने का उन्हें पूरा अधिकार है। चीन में कुछ ऐसे लोगों की मूर्तियां लगी हैं जिन पर लोग रोजाना थूकते हैं जूते मारते हैं और उन्हें हर प्रकार से अपमानित करते हैं ।ये सब इसलिए कि जिनकी वे मूर्तियां हैं उन्होंने कभी कदाचार किया था। भारत में न जाने कब कदाचारियों को इसी प्रकार सार्वजनिक तौर पर अपमानित किया जाएगा। अगर ऐसा होता है तो ये एक जीवित समाज का परिचायक होगा।
1991 में दूरदर्शन केन्द्र और तत्कालीन योजना आयोग की बिल्डिंगें आमने-सामने थीं। देश अंबेडकर जन्म शताब्दी मना रहा था। सरकार ने अंबेडकर के संपूर्ण कृतित्व के ऊपर बहुत सी पुस्तकें हार्डबाउंड बढ़िया काग़ज़ पर छपवाकर प्रकाशित कीं थीं। मुझे याद नहीं पर शायद इससे पहले कभी अंबेडकर पर इतना काम नहीं हुआ। उन्हीं किताबों को पढ़कर यह सुखद आश्चर्य हुआ कि भारत में भूसंबंधों पर डा. अंबेडकर ने अत्यधिक विस्तार से प्रामाणिक विवेचना की थी। भारत में भूसंबंधों के ऊपर इतना सटीक और श्रमसाध्य कार्य किसी अन्य व्यक्ति ने नहीं किया। अधिकांश अंबेडकरवादी भी इस तथ्य से वाक़िफ़ नहीं हैं। या फिर वे जानबूझकर अंबेडकर के इस पक्ष की अनदेखी कर देते हैं। यह किताब अछूत या हरिजन समस्या आदि पर नहीं बल्कि उस मूल कारण पर चोट करती है जिसके फलस्वरूप समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा मनुष्य होने की स्वाभाविक गरिमा से ही वंचित कर दिया गया। विश्व में शायद ही कोई ऐसा समाज हो जहाँ मानव समाज का इतना बड़ा हिस्सा मनुष्य होने से निचले स्तर पर धकेल दिया गया हो।
अंबेडकर राजनीतिक रूप से किस क़द के व्यक्ति थे यह प्रश्न महत्वपूर्ण नहीं है,महत्वपूर्ण यह है कि अंबेडकर को मानने वाले लोग, उनके अनुयाई आज के भारत में अनुपेक्षणीय उपस्थिति बन चुके हैं।हालाँकि इंसान-इंसान में बराबरी के लंबे संघर्ष का अभी मात्र शुभारंभ ही हुआ है।
ख़ुशी की बात ये है कि आज के युवा इस ग्रंथि से मुक्त होने के लिए ज्यादा तैयार हैं। तथाकथित सवर्ण जातियों के युवा भी जन्मना श्रेष्ठ होने जैसी मूर्खतापूर्ण और अवैज्ञानिक बकवास में कोई भरोसा नहीं करते। लेकिन सच्चाई यही है कि युवा चाहे सवर्ण हों या दलित अब उन्हें वैश्विक टल पर भिन्न-भिन्न समाजों को देखने समझने का मौका मिल रहा है। आज के युवा को जन्मगत श्रेष्ठता या निकृष्टता की बातें राजनीतिक धूर्तता के अतिरिक्त कुछ नहीं है। ऐसी चेतना शुभ है और स्वागत योग्य भी।
अंबेडकर इसी चेतना के प्रकाश स्तंभ हैं।
श्रीकांत सक्सेना (सोनीपत हरियाणा)
डायरेक्टर, पूर्व प्रोग्राम एक्सेक्टीव दूरदर्शन (उर्दू) नेशनल, दिल्ली










