डॉ. सैयद खालिद कैस (एडवोकेट)
मानव अधिकार कार्यकर्ता, लेखक एवं समीक्षक
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव नतीजे आने के बाद देश में केवल कांग्रेस नीत यू पी ए (UPA) सरकार का तख्ता पलट नहीं हुआ, वरन् मोदी नीत एन डी ए (NDA) सरकार ने देश की राजनीतिक और सामाजिक परिभाषा को ही बदल कर रख दिया। लोकतंत्र और जवाबदेही के जिस दौर का वादा किया गया था, उसकी हकीकत आंकड़ों और जमीनी फैसलों में कुछ और ही बयां होती है।
आर्थिक नीतियां, बेरोजगारी और नागरिक अधिकारों पर प्रहार
अमृत काल के दावों के बीच देश ने कई ऐसे फैसले देखे जिन्होंने आम नागरिक, किसान और व्यापारियों की कमर तोड़ दी:-
*नोटबंदी (2016):* सरकार ने इसे एक बड़ी उपलब्धि बताया, लेकिन इस कदम से देश की जीडीपी (GDP) ग्रोथ को भारी नुकसान हुआ। छोटे व्यापारी और कारीगर बर्बाद हो गए। इतना ही नहीं, नोटबंदी के दौरान बैंकों की लाइनों में लगकर 100 से ज्यादा बेगुनाह लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
*बेरोजगारी की मार:* CMIE (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी) के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2017-18 में बेरोजगारी दर 45 साल के उच्चतम स्तर (6.1%) पर जा पहुंची।
*कृषि कानून (2020)*: कृषि कानूनों के रूप में लाए गए 'तुगलकी फरमान' की बलि पर 700 से अधिक किसानों को अपनी शहादत देनी पड़ी, जिसके बाद सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े।
*प्रेस की आजादी पर संकट:* लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर इस दौरान गहरा प्रहार हुआ। World Press Freedom Index में भारत जो 2014 में 140वें स्थान पर था, वह 2023 में खिसककर 161वें स्थान पर आ गया। सरकार की नीतियों की आलोचना करने के कारण देश भर के नामी पत्रकारों को UAPA और ED जैसी केंद्रीय एजेंसियों की रेड का सामना करना पड़ा।
*दमनकारी नीतियां और वर्ग विशेष को निशाना बनाने का खेल*
इस कालखंड का सबसे खतरनाक परिणाम UAPA (गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) का बेजा और राजनीतिक इस्तेमाल रहा है। मॉब लिंचिंग, बुलडोजर कार्रवाई और हिजाब विवाद की आड़ में अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुस्लिम वर्ग को निशाना बनाया गया।
*NCRB का खौफनाक सच:*
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014 से 2020 के बीच देश भर में UAPA के तहत दर्ज मुकदमों की संख्या में 72% की भारी बढ़ोतरी हुई। इसके विपरीत, अदालतों में इन मामलों में दोषसिद्धि (Conviction Rate) की दर महज 2.8% रही। यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि UAPA के तहत दर्ज अधिकांश मुकदमे सिर्फ भय और आतंक का माहौल बनाकर एक वर्ग विशेष को टारगेट करने के लिए दर्ज किए गए।
अमृत काल में सरकार ने रचनात्मक आलोचना पर भी प्रहार किए, जबकि देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने बार-बार यह घोषित किया है कि "आलोचना लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा है।" दमनकारी हथकंडे अपनाकर नीतियों पर सवाल उठाने वाले पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नेताओं की आवाज को कुचला गया, जिससे हमारे संवैधानिक मूल्यों और संविधान की मूल भावना के साथ खिलवाड़ हुआ।
*2014 से 2026: झूठे आरोपों और अदालती न्याय की दास्तान*
यदि हम वर्ष 2014 से 2026 तक वर्ग विशेष (मुस्लिमों) पर लगाए गए आतंकी आरोपों और उनके बरी होने के मामलों को देखें, तो कोई आधिकारिक ऑल-इंडिया सरकारी आंकड़ा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। लेकिन विभिन्न न्यायालयों के ऐतिहासिक फैसलों और मीडिया रिपोर्ट्स ने जांच एजेंसियों के दावों की हवा निकाल दी है:
1. मुंबई ट्रेन ब्लास्ट केस (2006)
इस मामले में 13 मुस्लिम युवकों पर गंभीर आरोप लगाकर वर्षों तक जेल में कैद रखा गया।
9 साल बाद कोर्ट ने अब्दुल वाहिद शेख को बेगुनाह पाते हुए बरी किया।
वर्ष 2025 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने बाकी बचे 12 मुस्लिम व्यक्तियों को भी आरोपों से पूरी तरह दोषमुक्त कर दिया।
*चौंकाने वाला तथ्य:* निचली अदालत ने इनमें से 5 को फांसी और 7 को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे हाईकोर्ट ने पलट दिया। इन बेगुनाहों को अपनी जिंदगी के 19 कीमती साल सलाखों के पीछे काटने पड़े।
2. मक्का मस्जिद केस (हैदराबाद)
जांच एजेंसियों ने 4 मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया, जो 7 साल तक जेल में रहे। फरवरी 2014 में कोर्ट ने साफ कहा कि अभियोजन पक्ष के पास इनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है और उन्हें बरी कर दिया। इसी मामले में पकड़े गए 8 अन्य लोगों में से 5 'मुठभेड़' में मारे गए और बाकी 3 को 2017 में साक्ष्यों के अभाव में दोषमुक्त किया गया।
3. ओडिशा केस (अल-कायदा फंडिंग आरोप)
मोहम्मद अब्दुर रहमान अली खान पर अल-कायदा/IM के लिए फंडिंग का आरोप लगा। करीब 13 साल तक केस चलने के बाद अदालत ने माना कि उनके खिलाफ एक भी पुख्ता सबूत नहीं है और उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया गया।
4. दिल्ली NIA कोर्ट और कड़कड़डूमा कोर्ट के फैसले
दिल्ली की NIA कोर्ट ने आतंकी संगठन से लिंक के आरोप में गिरफ्तार दो मुस्लिम व्यक्तियों को एक साल के ट्रायल के बाद सबूतों की कमी के कारण बरी किया।
दिल्ली दंगे के नाम पर लूटपाट और आगजनी के झूठे आरोपों में फंसाए गए 6 मुस्लिम युवकों—गुलज़ार, शहज़ाद, वाजिद, साजिद, शहबाज़ और सलीम—को कड़कड़डूमा कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के दावों को खारिज करते हुए बाइज्जत बरी कर दिया।
5. मध्य प्रदेश हिजबुल तहरीर केस (2025)
जून 2025 में NIA और ATS ने भोपाल के मोहम्मद जुनैद, मोहम्मद वसीम और मोहम्मद करीम सहित 17 संदिग्धों को पकड़ा। जांच एजेंसियों का दावा था कि इनके पास से 'इस्लामिक साहित्य' मिला है।
मप्र हाईकोर्ट (जबलपुर खंडपीठ) के जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की डिवीजन बेंच ने ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा:
"केवल इस्लामिक साहित्य की फोटोकॉपी मिलने या किसी सेमिनार में भाग लेने से कोई आतंकवादी गतिविधियों में शामिल नहीं माना जा सकता।"
चूंकि NIA कोई ठोस डिजिटल सबूत या कॉल इंटरसेप्शन पेश नहीं कर सकी, इसलिए कोर्ट ने लंबा ट्रायल खिंचने के कारण तीनों को 2 लाख रुपये के मुचलके पर जमानत दे दी।
6. मौलाना अब्दुल रहमान केस (2025-2026)
दिल्ली, जमशेदपुर और कटक में अल-कायदा से कथित संबंधों के आरोपों का सामना कर रहे मौलाना अब्दुल रहमान को करीब 14 साल जेल में बिताने के बाद दिल्ली की स्पेशल सेशंस कोर्ट (2025-2026) ने दोषमुक्त किया। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इस ट्रायल को 2 महीने में पूरा किया गया था।
*निष्कर्ष: अलोकतांत्रिक कार्यप्रणाली का शिकार होता समाज*
NCRB के विस्तृत विश्लेषण के अनुसार, 2014 से 2022 के बीच UAPA के तहत लगभग 8,947 गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन अदालतों में दोषसिद्धि की दर महज 2 से 3 प्रतिशत ही रही।
यह बेहद चिंताजनक आंकड़े और अदालती फैसले इस कड़वी सच्चाई को उजागर करते हैं कि जांच एजेंसियों का एक बड़ा हिस्सा वर्ग विशेष को टारगेट करने, उन्हें समाज में आतंकी और समाजविरोधी घोषित करने, और उनके भीतर भय का माहौल पैदा करने के अलोकतांत्रिक रास्ते पर चल रहा है। बिना ठोस सबूतों के सालों-साल जेल में बंद रखकर बेगुनाहों को प्रताड़ित और बदनाम करना किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए एक गहरा कलंक है।
जब वर्षों बाद न्याय मिलता है, तब तक कई जिंदगियां और परिवार तबाह हो चुके होते हैं। ऐसे में यह सवाल मौजूं हो जाता है कि आस्तीन पर लगे इन बेगुनाह लहू के दागों का हिसाब कौन देगा?










