डॉक्टर सैयद खालिद कैस एडवोकेट
आलोचक, समीक्षक, पत्रकार।
भारतीय सेना की कर्नल सोफिया कुरैशी ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जिस बहादुरी और शौर्य से देश का प्रतिनिधित्व किया, उसने हर भारतीय का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। वह पूरे देश के लिए नारी शक्ति और सेना के शौर्य का प्रतीक बन गईं। लेकिन उसी वीरांगना के खिलाफ मध्य प्रदेश सरकार के जनजातीय कार्य मंत्री विजय शाह ने मंच से जो अमर्यादित, अशोभनीय और सांप्रदायिक टिप्पणी की, उसने न सिर्फ सेना का बल्कि पूरे देश का अपमान किया है।
देश के इतिहास में शायद पहली बार हुआ कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट को स्वतः संज्ञान लेकर कहना पड़ा कि यह देश की सेना का अपमान है और तुरंत एफआईआर दर्ज की जाए। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बयान को शर्मनाक बताया। इसके बावजूद मोहन यादव सरकार अपने मंत्री को बचाने के लिए हर हथकंडा अपना रही है। यह कोई सामान्य देरी नहीं, यह एक सोची-समझी राजनीतिक बचाव रणनीति है।
आदिवासी वोट बैंक का डर
विजय शाह 8 बार के विधायक हैं और आदिवासी समाज में भाजपा का बड़ा चेहरा हैं। महाकौशल और मालवा में उनका प्रभाव है। भाजपा सरकार को डर है कि अगर उन्हें बर्खास्त किया गया तो आदिवासी समाज में गलत संदेश जाएगा और 2028 के विधानसभा चुनाव में नुकसान होगा। इसलिए सरकार ने देशभक्ति से ऊपर वोट बैंक को रख दिया है।
संगठन के भीतर संतुलन साधने की मजबूरी
मोहन यादव सरकार अभी खुद को स्थापित करने की कोशिश में है। विजय शाह पुराने और कद्दावर नेता हैं। अगर उन पर कार्रवाई होती है तो पार्टी के भीतर शिवराज खेमे और अन्य वरिष्ठ नेताओं में नाराजगी बढ़ सकती है। मोहन यादव किसी भी तरह का आंतरिक विद्रोह नहीं चाहते, इसलिए वे कार्रवाई टाल रहे हैं।
एफआईआर में खेल और कानूनी लीपापोती
हाईकोर्ट के आदेश के बाद जो एफआईआर दर्ज हुई, उसमें भी सरकार की मंशा साफ दिखी। पहले कमजोर धाराएं लगाना, फिर सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद एसआईटी बनाना - यह सब समय बिताने और मामले को ठंडा करने की तरकीब है। सरकार चाहती है कि मीडिया और जनता का ध्यान हट जाए और मंत्री धीरे-धीरे बच जाएं।
भाजपा की दोहरी नीति
दूसरी पार्टियों के नेताओं के सेना पर दिए बयानों पर भाजपा देशद्रोह तक का आरोप लगा देती है, लेकिन जब अपनी पार्टी का मंत्री सीधे तौर पर एक महिला कर्नल को निशाना बनाता है, तो पूरी सरकार मौन हो जाती है। मुख्यमंत्री का न तो कड़ा बयान आया, न ही प्रधानमंत्री या गृहमंत्री ने इस पर सार्वजनिक रूप से फटकार लगाई। यह मौन ही सहमति है।
मोहन यादव सरकार यह भूल रही है कि जनता सब देख रही है। यह मामला किसी पार्टी का नहीं, भारतीय सेना के सम्मान का है। कर्नल सोफिया किसी धर्म या जाति की नहीं, 140 करोड़ भारतीयों की बेटी हैं। एक मंत्री को बचाने के लिए अगर सरकार सेना के सम्मान से समझौता करती है, तो यह मध्य प्रदेश ही नहीं, पूरे देश के लिए शर्म की बात है।
इतिहास गवाह है, जो सरकारें अहंकार में सेना और जनता की भावना को नजरअंदाज करती हैं, जनता उन्हें कभी माफ नहीं करती।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मोहन सरकार की घेराबंदी - विजय शाह केस में अब क्या करेगी भाजपा?
कर्नल सोफिया कुरैशी मामले में जब मोहन यादव सरकार अपने मंत्री विजय शाह को बचाने में जुटी थी, तब सुप्रीम कोर्ट ने सीधा हस्तक्षेप कर सरकार की पूरी रणनीति को ध्वस्त कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि मंत्री का बयान शर्मनाक है, अभद्र है और यह सेना के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाला है। कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि केवल एफआईआर दर्ज करना काफी नहीं है, कार्रवाई क्या हुई?
सुप्रीम कोर्ट के 4 बड़े निर्देश जिन्होंने मोहन सरकार को बैकफुट पर ला दिया:
एसआईटी का गठन अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच स्थानीय पुलिस नहीं, बल्कि तीन वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों की विशेष जांच टीम (SIT) करेगी। इससे सरकार का अपने अफसरों के जरिए मामले को कमजोर करने का प्लान फेल हो गया।
हाईकोर्ट की निगरानी में जांच:कोर्ट ने कहा कि जांच की निगरानी मध्य प्रदेश हाईकोर्ट करेगा। यानी अब सरकार या मुख्यमंत्री कार्यालय से जांच को प्रभावित नहीं किया जा सकेगा। हर स्टेटस रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश होगी।
माफी पर्याप्त नहीं:विजय शाह ने वीडियो जारी कर माफी मांगी थी, जिसे सरकार ढाल बनाकर पेश कर रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा - यह अपराध माफी से खत्म नहीं होता। एक सैन्य अधिकारी का सार्वजनिक अपमान गंभीर अपराध है।
मंत्री पद पर बने रहने पर सवाल:सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या एक व्यक्ति जिस पर सेना के अपमान की गंभीर धाराओं में केस चल रहा है, वह कैबिनेट मंत्री बना रह सकता है? कोर्ट ने नैतिकता का सवाल उठाकर मोहन यादव सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
मोहन सरकार के पास अब दो ही रास्ते
पहला - सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन करते हुए विजय शाह को तुरंत कैबिनेट से बर्खास्त करे और निष्पक्ष जांच होने दे। इससे सरकार कम से कम सेना और जनता के बीच अपनी छवि बचा सकती है।
दूसरा - अभी भी मंत्री को बचाने की कोशिश करे। लेकिन अगर सरकार दूसरा रास्ता चुनती है तो यह अवमानना की ओर जाएगा और पूरे देश में भाजपा की राष्ट्रवाद की छवि को गहरा नुकसान पहुंचेगा।
अब गेंद पूरी तरह मोहन यादव सरकार के पाले में है। सुप्रीम कोर्ट ने संविधान का रास्ता दिखा दिया है, देखना है कि सरकार वोट बैंक की राजनीति चुनती है या भारतीय सेना के सम्मान को।










