लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा जाता है। इसका काम सत्ता से सवाल पूछना, सच को सामने लाना और जनता की आवाज को बुलंद करना है। लेकिन आज पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा अपने मूल धर्म से भटक गया है। उसकी जगह ले ली है *चाटुकारी पत्रकारिता* ने, जो धीरे-धीरे असली पत्रकारिता को नष्ट कर रही है।
चाटुकारी पत्रकारिता क्या है?
जब पत्रकार या समाचार संस्थान, सत्ता, पूंजीपति या किसी विशेष विचारधारा के पक्ष में सच को तोड़-मरोड़ कर पेश करने लगे, उसके गुणगान में ही लगे रहे और आलोचना से बचने लगे, तो उसे चाटुकारी पत्रकारिता कहते हैं। इसमें खबर नहीं, बल्कि महिमामंडन परोसा जाता है। सवाल की जगह जय-जयकार ले लेती है।
यह पत्रकारिता को कैसे नष्ट कर रही है?
1. विश्वसनीयता का संकट: पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी उसकी विश्वसनीयता है। जब जनता देखती है कि चैनल या अखबार दिन-रात एक ही व्यक्ति या पार्टी की तारीफ कर रहा है, तो उसका भरोसा टूट जाता है। आज यही हो रहा है। लोग मुख्यधारा की मीडिया को 'गोदी मीडिया' कहने लगे हैं। यह शब्द ही इस संकट को दिखाता है।
2. सवाल पूछने की परंपरा खत्म: एक सच्चे पत्रकार का काम है - क्यों, कैसे, कब? लेकिन चाटुकार पत्रकार सवाल नहीं पूछता। वह प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी सत्ता से असहज सवाल पूछने से डरता है। जब पत्रकार ही सत्ता का प्रवक्ता बन जाएगा, तो लोकतंत्र में जवाबदेही कौन तय करेगा?
3. जनहित के मुद्दे गायब: चाटुकारी पत्रकारिता में महंगाई, बेरोजगारी, किसान, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे असली मुद्दे गायब हो जाते हैं। प्राइम टाइम पर हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद, और नेताओं के कपड़ों और भाषणों पर घंटों बहस होती है। जनता को असली समस्याओं से भटकाया जाता है।
4. निष्पक्ष पत्रकारों का दमन: जब चाटुकारी पत्रकारिता को पुरस्कृत किया जाता है, तो ईमानदार पत्रकार हाशिए पर चला जाता है। उसे नौकरी से निकाला जाता है, उसके विज्ञापन रोके जाते हैं, उसे ट्रोल किया जाता है, और कई बार तो गौरी लंकेश जैसी कीमत भी चुकानी पड़ती है। इससे नई पीढ़ी में भी यही संदेश जाता है कि तरक्की करनी है तो चाटुकारी ही करनी पड़ेगी।
5. लोकतंत्र को खतरा:अगर मीडिया सत्ता की गोद में बैठ जाएगा, तो कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका पर निगरानी कौन रखेगा? बिना स्वतंत्र मीडिया के लोकतंत्र अधूरा है। चाटुकारी पत्रकारिता अंततः तानाशाही को मजबूत करती है।
समाधान क्या है?
इस स्थिति से निकलने के लिए हमें फिर से पत्रकारिता के मूल्यों की ओर लौटना होगा। पाठकों और दर्शकों को जागरूक होना होगा और चाटुकारी खबरों का बहिष्कार करना होगा। पत्रकार संगठनों जैसे *एडिटर्स कौंसिल ऑफ इंडिया* को निर्भीक पत्रकारों के साथ खड़ा होना होगा। पत्रकार को यह समझना होगा कि उसकी वफादारी किसी नेता या पार्टी के प्रति नहीं, बल्कि देश की जनता और सत्य के प्रति है।
इतिहास गवाह है कि चाटुकारी पत्रकारिता ज्यादा दिन नहीं टिकती। सत्ता आती-जाती रहती है, लेकिन जो पत्रकार सच के साथ खड़ा रहता है, उसका नाम ही इतिहास में सम्मान से लिया जाता है। इसलिए आज जरूरत है - निडर, निष्पक्ष और जनपक्षीय पत्रकारिता की।
@सैयद खालिद कैस,लेखक ,समीक्षक,आलोचक,पत्रकार










