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स्वच्छ हवा, नागरिकों का अधिकार: उपायों की भरमार के बावजूद असर सवालों के घेरे में

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स्वतंत्र पत्रकार — लवप्रीत सिंह


साँस लेना मनुष्य के जीवन की सबसे सामान्य, सबसे सहज और सबसे अनिवार्य प्रक्रिया है। हम दिनभर में कितनी बार साँस लेते हैं, इसका हिसाब नहीं रखते, क्योंकि साँस लेना हमारे जीवन का इतना स्वाभाविक हिस्सा है कि उसके महत्व का एहसास तभी होता है जब हवा में साँस लेना कठिन हो जाए। लेकिन आज देश के कई बड़े शहरों में यही सहज अधिकार धीरे-धीरे संकट में बदल रहा है। हवा दिखाई नहीं देती, इसलिए उसका प्रदूषण भी दीवार, सड़क या कूड़े के ढेर की तरह आँखों के सामने नहीं दिखता, लेकिन उसके प्रभाव से कोई बच नहीं सकता। बच्चे, बुजुर्ग, मजदूर, दुकानदार, वाहन चालक, पुलिसकर्मी, निर्माण श्रमिक और कार्यालय जाने वाले लोग—हर व्यक्ति उसी हवा में साँस लेता है। इसलिए स्वच्छ हवा का सवाल केवल पर्यावरण का सवाल नहीं है; यह सीधे-सीधे जीवन, स्वास्थ्य, नागरिक अधिकार और सरकार की जवाबदेही से जुड़ा प्रश्न है।

24 सितंबर 2026 की अखबारी चर्चा में सामने आया सवाल—वायु प्रदूषण से निपटने के उपायों की भरमार के बावजूद उसका असर अब भी सवालों के घेरे में क्यों है—दरअसल आज के शहरी भारत की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक को सामने रखता है। योजनाएँ हैं, आयोग हैं, विभाग हैं, निगरानी केंद्र हैं, मशीनें हैं, दिशा-निर्देश हैं, प्रदूषण नियंत्रण के लिए अलग-अलग अभियान हैं और हर वर्ष सर्दी आने से पहले बैठकों का दौर भी शुरू हो जाता है। फिर भी दिल्ली और उसके आसपास रहने वाले लोग हर साल वही सवाल पूछते हैं कि आखिर हवा साफ क्यों नहीं हो रही है? प्रदूषण रोकने के लिए इतने उपाय होने के बावजूद जमीन पर वह परिवर्तन क्यों नहीं दिखाई देता जिसकी अपेक्षा नागरिक करते हैं?

इस सवाल का जवाब केवल एक प्रदूषक, एक विभाग या एक मौसम में तलाशना संभव नहीं है। वायु प्रदूषण कई स्रोतों से पैदा होता है और हर शहर में उसकी परिस्थितियाँ अलग हैं। फिर भी दिल्ली-एनसीआर की चर्चा करते समय एक बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि सड़क की धूल और निर्माण गतिविधियों से निकलने वाली धूल प्रदूषण की गंभीर समस्या का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, खासकर PM10 जैसे बड़े कणों के संदर्भ में। दिल्ली, गुरुग्राम और गाजियाबाद में यदि किसी आम नागरिक से पूछा जाए कि वह अपने आसपास प्रदूषण के सबसे प्रत्यक्ष स्रोत क्या देखता है, तो उसका ध्यान सबसे पहले सड़क पर उड़ती धूल, निर्माण स्थल से निकलते महीन कण, खुले में पड़ा मलबा और बिना ढके चलने वाले ट्रकों की ओर जाएगा। यही वह प्रदूषण है जिसे नागरिक अपनी आँखों से देख सकता है और जिसका समाधान भी जमीन पर दिखाई देना चाहिए।

दिल्ली की सड़कों पर रोजाना लाखों वाहनों की आवाजाही होती है। भारी वाहन, बसें, कारें, दोपहिया वाहन और माल ढोने वाले ट्रक केवल अपने धुएँ से ही प्रदूषण नहीं बढ़ाते, बल्कि सड़क पर पहले से जमा धूल को भी बार-बार हवा में उठाते हैं। सड़क के किनारे की मिट्टी, टूटे फुटपाथ, खुले डिवाइडर, निर्माण सामग्री, गड्ढों की मरम्मत के बाद बची मिट्टी और खाली भूखंडों से आने वाले कण यातायात के दबाव में फिर हवा में मिल जाते हैं। एक वाहन गुजरता है, धूल उठती है; दूसरा वाहन आता है, वही धूल फिर ऊपर जाती है। दिनभर यह प्रक्रिया चलती रहती है। ऐसे में सड़क की धूल कोई एक बार पैदा होने वाला प्रदूषण नहीं है, बल्कि लगातार पुनः हवा में लौटने वाला स्रोत है।

यही कारण है कि केवल वाहनों के धुएँ पर ध्यान देकर दिल्ली की वायु समस्या का पूरा समाधान नहीं किया जा सकता। वाहन प्रदूषण निश्चित रूप से गंभीर है और उस पर नियंत्रण आवश्यक है, लेकिन सड़क की धूल को कम करना भी उतना ही जरूरी है। यदि सड़क के किनारे मिट्टी खुली पड़ी है, यदि फुटपाथ टूटे हैं, यदि निर्माण सामग्री सड़क पर बिखरी है और यदि सफाई की व्यवस्था ऐसी है कि धूल एक स्थान से हटकर दूसरे स्थान पर पहुँच जाती है, तो वाहन उत्सर्जन कम होने के बावजूद नागरिकों को धूल का सामना करना पड़ता रहेगा।

दिल्ली में निर्माण गतिविधियाँ इस समस्या को और जटिल बनाती हैं। राजधानी और आसपास के इलाकों में शायद ही कोई ऐसा समय आता हो जब कहीं सड़क निर्माण, फ्लाईओवर, मेट्रो, भवन, व्यावसायिक परिसर, आवासीय परियोजना या सरकारी आधारभूत ढाँचे का काम न चल रहा हो। विकास आवश्यक है। शहरों का विस्तार भी आवश्यक है। नई सड़कें, अस्पताल, स्कूल, घर, कार्यालय और सार्वजनिक सुविधाएँ बननी ही चाहिए। लेकिन विकास के साथ प्रदूषण नियंत्रण की जिम्मेदारी भी उसी गति से बढ़नी चाहिए। समस्या तब पैदा होती है जब निर्माण स्थल पर रेत, बजरी, सीमेंट, मिट्टी और मलबा खुले में पड़ा रहता है, ट्रक बिना ढके निकलते हैं और निर्माण क्षेत्र से बाहर निकलने वाले वाहनों के पहियों के साथ मिट्टी सड़कों पर फैलती रहती है।

निर्माण स्थल से उड़ने वाली धूल केवल उस स्थल तक सीमित नहीं रहती। हवा और यातायात उसे आसपास की सड़कों और आवासीय क्षेत्रों तक ले जाते हैं। भवन तोड़ने, कंक्रीट काटने, मिट्टी खोदने और मलबा हटाने के दौरान पैदा होने वाले कण आसपास के वातावरण में फैल सकते हैं। इसलिए निर्माण परियोजना के चारों ओर केवल बोर्ड लगा देना कि “धूल नियंत्रण के उपाय किए जा रहे हैं”, पर्याप्त नहीं है। सवाल यह होना चाहिए कि वास्तव में कितनी धूल बाहर जा रही है और उसे रोकने के लिए क्या किया जा रहा है।

निर्माण स्थल पर उचित बैरिकेडिंग, धूलरोधी जाल, सामग्री को ढककर रखना, वाहनों के पहियों की सफाई, मलबे का ढका हुआ परिवहन, नियमित नियंत्रित पानी का छिड़काव और निर्माण स्थल से बाहर आने वाले रास्तों की सफाई जैसे उपाय व्यवहार में दिखाई देने चाहिए। केवल एंटी-स्मॉग गन खड़ी कर देना समाधान नहीं है। मशीन चल रही है या नहीं, सही स्थान पर चल रही है या नहीं, कितनी देर चल रही है और उससे वास्तविक धूल कितनी कम हो रही है—इन सवालों की निगरानी भी होनी चाहिए। यदि मशीन केवल निरीक्षण के समय चलती है और बाकी समय निर्माण स्थल खुले रूप में धूल उड़ाता रहता है, तो ऐसी व्यवस्था का नागरिकों को कोई लाभ नहीं मिलेगा।

गुरुग्राम इस पूरी समस्या का एक बड़ा उदाहरण है। कुछ दशक पहले तक अपेक्षाकृत कम आबादी वाला क्षेत्र आज देश के सबसे तेजी से विकसित होते महानगरीय इलाकों में शामिल है। ऊँची इमारतें, कॉरपोरेट कार्यालय, नए आवासीय परिसर, सड़कें, एक्सप्रेसवे और व्यावसायिक परियोजनाएँ शहर की पहचान बन चुकी हैं। लेकिन जितनी तेजी से इमारतें बढ़ीं, उतनी ही तेजी से धूल नियंत्रण की व्यवस्था हर स्थान पर नहीं बढ़ सकी। शहर के कई हिस्सों में निर्माण और यातायात एक साथ चलते हैं। एक तरफ भारी वाहन और दूसरी तरफ निर्माण सामग्री से भरे ट्रक। बीच में आम नागरिक, पैदल यात्री और सड़क किनारे काम करने वाले लोग। ऐसे माहौल में सड़क की धूल हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाला स्पष्ट स्थानीय स्रोत बन जाती है।

गुरुग्राम में केवल निर्माण स्थल की चारदीवारी के भीतर धूल नियंत्रित करने से काम नहीं चलेगा। निर्माण स्थल से बाहर आने वाले ट्रकों के पहियों से सड़क पर आने वाली मिट्टी, सड़क के किनारे खुली जमीन, अधूरे फुटपाथ और निर्माण के बाद छोड़े गए कच्चे हिस्सों का भी उपचार जरूरी है। यदि किसी परियोजना के बाहर की सड़क पर लगातार धूल जमा हो रही है तो उस परियोजना की पर्यावरणीय जिम्मेदारी केवल उसकी चारदीवारी के अंदर तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसी तरह नगर निकाय और सड़क एजेंसियों को भी यह देखना होगा कि सड़क निर्माण या मरम्मत के बाद किनारों पर मिट्टी खुली न रह जाए।

गाजियाबाद की स्थिति भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। दिल्ली से सटा हुआ यह शहर भारी यातायात, घनी आबादी, औद्योगिक गतिविधियों, व्यावसायिक क्षेत्रों और तेजी से बढ़ते निर्माण के बीच विकसित हुआ है। यहाँ कई प्रमुख मार्गों पर दिनभर भारी वाहनों की आवाजाही रहती है। सड़क के किनारे की धूल वाहनों के पहियों से बार-बार हवा में उठती है। निर्माण स्थलों से निकलने वाली मिट्टी और मलबा इस समस्या को बढ़ाता है। घनी आबादी वाले इलाकों में इसका प्रभाव और गंभीर हो सकता है क्योंकि सड़क और घरों के बीच पर्याप्त दूरी या हरित पट्टी नहीं होती। दुकान चलाने वाला व्यक्ति, सड़क किनारे बैठा छोटा व्यापारी या पैदल चलने वाला व्यक्ति उसी धूल को सीधे साँस में लेता है।

गाजियाबाद जैसे शहरों में सड़क की सफाई का अर्थ केवल झाड़ू लगाना नहीं होना चाहिए। यदि सूखी झाड़ू से सड़क की धूल उठाकर हवा में फैला दी जाए तो सफाई का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। आधुनिक यांत्रिक सफाई, धूल को नियंत्रित तरीके से उठाना और उसके बाद उसका सुरक्षित निस्तारण अधिक महत्वपूर्ण है। सड़क के किनारे की खुली मिट्टी को स्थायी रूप से नियंत्रित करना होगा। जहाँ संभव हो वहाँ पक्का फुटपाथ, हरित पट्टी या अन्य धूलरोधी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। सड़क किनारे पार्किंग की अव्यवस्था भी कई जगह मिट्टी और धूल को मुख्य सड़क तक पहुँचाती है। इसलिए यातायात व्यवस्था और वायु प्रदूषण को अलग-अलग विषय मानना भी उचित नहीं होगा।

दिल्ली, गुरुग्राम और गाजियाबाद की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इन शहरों की हवा प्रशासनिक सीमाओं को नहीं मानती। दिल्ली में पैदा हुआ प्रदूषण केवल दिल्ली में नहीं रहता। गुरुग्राम और गाजियाबाद में पैदा होने वाले प्रदूषक भी हवा की दिशा के अनुसार दूसरे इलाकों तक पहुँच सकते हैं। वाहन एक शहर से दूसरे शहर जाते हैं। मालवाहक ट्रक कई राज्यों से होकर गुजरते हैं। निर्माण सामग्री और मलबे का परिवहन क्षेत्रीय स्तर पर होता है। इसलिए एनसीआर के लिए अलग-अलग नगर निकायों की अलग-अलग रणनीतियाँ पर्याप्त नहीं होंगी। साझा योजना, साझा निगरानी और साझा जवाबदेही आवश्यक है।

अखबार की दी गई कटिंग में विशेषज्ञ की ओर से योजनागत कमियों और विभिन्न स्तरों पर समन्वय की समस्या की ओर ध्यान दिलाया गया है। यह बात महत्वपूर्ण है। दिल्ली की हवा को केवल इसलिए साफ नहीं किया जा सकता कि हर साल नई योजना घोषित कर दी जाए। योजना की असली परीक्षा उसके जमीन पर उतरने में है। यदि सार्वजनिक परिवहन पर्याप्त नहीं है तो निजी वाहनों पर निर्भरता बनी रहेगी। यदि निर्माण धूल पर स्थायी नियंत्रण नहीं है तो हर वर्ष नए निर्माण स्थल प्रदूषण का नया स्रोत बनेंगे। यदि सड़क की मरम्मत और सफाई नियमित नहीं है तो धूल फिर जमा होगी। यदि नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई नहीं होगी तो नियम केवल कागज पर रह जाएंगे।

यही सवाल हमें कानपुर की ओर भी ले जाता है। कानपुर की वायु समस्या का स्वरूप दिल्ली से अलग है, लेकिन यहाँ भी सड़क, यातायात, औद्योगिक गतिविधियों और निर्माण से जुड़ी चुनौतियाँ मौजूद हैं। औद्योगिक शहर होने के कारण वहाँ प्रदूषण के स्रोतों की प्रकृति व्यापक है। यदि उद्योगों से निकलने वाले उत्सर्जन पर निगरानी हो और सड़क की धूल को नजरअंदाज कर दिया जाए तो तस्वीर अधूरी रहेगी। यदि सड़क की सफाई की जाए लेकिन औद्योगिक उत्सर्जन की अनदेखी हो तो भी परिणाम अधूरा रहेगा। प्रदूषण नियंत्रण का अर्थ सभी प्रमुख स्रोतों को एक साथ संबोधित करना है।

कानपुर में तेजी से बढ़ते शहरी क्षेत्र और नई निर्माण गतिविधियों के साथ धूल नियंत्रण को भी विकास योजना का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। सड़क चौड़ीकरण, नई कॉलोनियाँ, व्यावसायिक परिसर और अन्य निर्माण कार्य शहर के विकास के लिए जरूरी हो सकते हैं, लेकिन प्रत्येक परियोजना के साथ धूल नियंत्रण की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। भारी वाहनों के लिए निर्धारित मार्ग, निर्माण सामग्री का सुरक्षित परिवहन और औद्योगिक क्षेत्रों में सड़क सफाई जैसे उपाय स्थानीय स्तर पर प्रभावी हो सकते हैं। किसी भी शहर में प्रदूषण नियंत्रण की शुरुआत इस पहचान से होनी चाहिए कि वास्तव में प्रदूषण पैदा कहाँ हो रहा है।

हैदराबाद की कहानी भी हमें यही सबक देती है। यह देश के तेजी से विकसित होते महानगरों में है। आईटी क्षेत्र, रियल एस्टेट, सड़क परियोजनाएँ और लगातार फैलता शहरी क्षेत्र वहाँ बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियों को जन्म देते हैं। शुष्क परिस्थितियों में खुले भूखंडों, निर्माण स्थलों और सड़क किनारे की मिट्टी से उड़ने वाली धूल स्थानीय वायु गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है। वहाँ भी समाधान का रास्ता केवल वाहनों के उत्सर्जन पर कार्रवाई करने से पूरा नहीं होगा। सड़क की धूल, निर्माण स्थल और खुले क्षेत्रों के प्रबंधन को उतना ही महत्व देना होगा।

भारत के महानगरों में एक समान गलती बार-बार होती दिखाई देती है। शहर पहले फैलता है और पर्यावरणीय व्यवस्था बाद में उसके पीछे भागती है। पहले सड़क बनती है, फिर फुटपाथ के बारे में सोचा जाता है। पहले निर्माण शुरू होता है, फिर धूल नियंत्रण के नियमों को याद किया जाता है। पहले ट्रक चलने लगते हैं, फिर उनके मार्ग और पहियों की सफाई पर चर्चा होती है। पहले खाली जमीन धूल का स्रोत बन जाती है, फिर उसे नियंत्रित करने की योजना बनाई जाती है। हमें इस क्रम को बदलना होगा। पर्यावरणीय योजना विकास परियोजना शुरू होने से पहले बननी चाहिए, बाद में नहीं।

मौसम के बदलने के साथ यह समस्या और गंभीर होने वाली है। मानसून के दौरान बारिश सड़क और जमीन पर मौजूद धूल को कुछ समय के लिए दबा देती है। लेकिन जैसे-जैसे बारिश कम होती है और जमीन सूखती है, धूल फिर सक्रिय हो जाती है। सितंबर के बाद अक्टूबर और नवंबर में दिल्ली-एनसीआर की परिस्थितियाँ बदलने लगती हैं। तापमान में गिरावट, हवा की गति में कमी और वातावरण की स्थिरता के कारण प्रदूषकों का फैलाव प्रभावित हो सकता है। सर्दियों में तापमान प्रतिलोमन जैसी परिस्थितियाँ प्रदूषकों को जमीन के पास रोक सकती हैं। ऐसे समय में जो धूल दिनभर सड़क पर जमा होती है, वह वाहनों के गुजरने के साथ हवा में उठती रहती है और पहले से मौजूद अन्य प्रदूषकों के साथ मिल जाती है।

इसीलिए सर्दियों का प्रदूषण केवल नवंबर में शुरू होने वाला विषय नहीं है। असल तैयारी मानसून के बाद शुरू हो जानी चाहिए। अक्टूबर आने तक निर्माण स्थलों का निरीक्षण, सड़क की सफाई, खुले भूखंडों की पहचान, भारी वाहनों के मार्ग की समीक्षा और प्रदूषण के स्थानीय स्रोतों की निगरानी शुरू हो जानी चाहिए। अगर प्रशासन दिसंबर में जागता है तो तब तक प्रदूषण का संकट गहरा चुका होता है। प्रदूषण का इलाज संकट आने के बाद करने के बजाय संकट पैदा करने वाले स्रोतों पर पहले से नियंत्रण करना कहीं अधिक प्रभावी होगा।

पराली जलाने का मुद्दा भी इसी मौसम में चर्चा में आता है। पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में फसल अवशेष जलाने से निकलने वाला धुआँ दिल्ली-एनसीआर की वायु गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है, विशेषकर प्रतिकूल मौसम परिस्थितियों में। लेकिन पराली की चर्चा करते समय स्थानीय प्रदूषण के स्रोतों को नजरअंदाज करना उचित नहीं है। यदि दिल्ली में सड़क की धूल उड़ रही है, गुरुग्राम में निर्माण स्थल खुले हैं और गाजियाबाद में भारी वाहनों से धूल उठ रही है, तो इन स्रोतों को नियंत्रित करना भी उतना ही आवश्यक है। किसी एक स्रोत को पूरे प्रदूषण का कारण बता देना समस्या को सरल बनाना है, समाधान करना नहीं।

वाहनों का प्रदूषण भी गंभीर मुद्दा है। दिल्ली में मेट्रो की सफलता बताती है कि जब नागरिकों को सुविधाजनक सार्वजनिक परिवहन मिलता है तो निजी वाहनों का विकल्प मौजूद होता है। लेकिन एनसीआर के पूरे क्षेत्र में अंतिम छोर तक बेहतर कनेक्टिविटी, बस सेवा, पैदल मार्ग और सुरक्षित परिवहन उपलब्ध कराना होगा। केवल इलेक्ट्रिक वाहन बढ़ा देना पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि इलेक्ट्रिक वाहन भी सड़क पर चलते हैं और सड़क पर जमा धूल को हवा में उठा सकते हैं। वाहन उत्सर्जन और सड़क धूल दोनों पर एक साथ काम करना होगा।

सड़क की धूल को कम करने के लिए सबसे पहले सड़क की संरचना सुधारनी होगी। गड्ढे, टूटे फुटपाथ, खुले किनारे और कच्ची पट्टियाँ धूल के स्थायी स्रोत बनते हैं। सड़क निर्माण के बाद किनारों की फिनिशिंग अधूरी छोड़ देना भविष्य के प्रदूषण को न्योता देना है। पाइपलाइन या बिजली के काम के बाद सड़क को ठीक से बहाल न करना भी यही समस्या पैदा करता है। अलग-अलग एजेंसियाँ एक ही सड़क को बार-बार खोदती हैं और हर बार थोड़ी मिट्टी सड़क पर छोड़ देती हैं। कुछ महीनों बाद वही मिट्टी वाहनों की आवाजाही से महीन धूल में बदल जाती है। इसलिए सड़क प्रबंधन को भी वायु प्रदूषण नियंत्रण की नीति में शामिल करना होगा।

निर्माण उद्योग के लिए भी जिम्मेदारी स्पष्ट होनी चाहिए। किसी बड़े प्रोजेक्ट को अनुमति देते समय यह देखा जाना चाहिए कि उसके कारण कितनी धूल पैदा होगी और उसे रोकने की योजना क्या है। परियोजना के बजट में धूल नियंत्रण की लागत स्पष्ट रूप से शामिल होनी चाहिए। ठेकेदार को केवल निर्माण पूरा करने के लिए भुगतान करने के बजाय पर्यावरणीय शर्तों के पालन से भी जोड़ा जा सकता है। बार-बार उल्लंघन होने पर जुर्माना या काम रोकने की कार्रवाई का वास्तविक खतरा होना चाहिए। जब तक नियम तोड़ने की लागत नियम मानने की लागत से अधिक नहीं होगी, तब तक कुछ कंपनियाँ पर्यावरणीय शर्तों को गंभीरता से नहीं लेंगी।

सरकार को केवल बड़ी निर्माण परियोजनाओं पर ध्यान नहीं देना चाहिए। दिल्ली, गुरुग्राम और गाजियाबाद जैसे शहरों में हजारों छोटे भवन निर्माण और मरम्मत के काम होते हैं। मकान टूटते हैं, नए फ्लोर बनते हैं, दुकानें बदलती हैं, सड़क किनारे मरम्मत होती है। प्रत्येक छोटा स्रोत अपने स्तर पर छोटा हो सकता है, लेकिन हजारों छोटे स्रोत मिलकर बड़ा प्रभाव पैदा करते हैं। इसलिए स्थानीय स्तर पर सरल और स्पष्ट नियम आवश्यक हैं। भवन मालिकों और ठेकेदारों को मलबा खुले में छोड़ने, बिना ढके ट्रक चलाने या सड़क पर निर्माण सामग्री फैलाने की अनुमति नहीं होनी चाहिए।

प्रदूषण नियंत्रण में केवल सरकार को दोष देना भी पर्याप्त नहीं होगा। नागरिकों की भूमिका भी है। कचरा खुले में जलाना बंद करना, निजी निर्माण में सामग्री को ढककर रखना, वाहन की नियमित जाँच कराना, अनावश्यक वाहन उपयोग कम करना और स्थानीय स्तर पर उल्लंघनों की सूचना देना नागरिक सहयोग के महत्वपूर्ण रूप हैं। लेकिन नागरिकों से सहयोग तभी प्रभावी ढंग से माँगा जा सकता है जब प्रशासन स्वयं अपने हिस्से की जिम्मेदारी पूरी करे। जिस नागरिक को रोज धूल भरी सड़क से गुजरना पड़ता है, उससे केवल यह कहना कि वह प्रदूषण न फैलाए, समस्या का समाधान नहीं है।

स्वच्छ हवा का प्रश्न सामाजिक असमानता से भी जुड़ा है। बड़े घरों में रहने वाले लोग एयर प्यूरिफायर लगा सकते हैं, खिड़कियाँ बंद रख सकते हैं और प्रदूषण वाले दिनों में घर से काम कर सकते हैं। लेकिन सड़क किनारे फल बेचने वाला, ऑटो चालक, रिक्शा चालक, डिलीवरी कर्मचारी, निर्माण मजदूर या ट्रैफिक पुलिसकर्मी आठ-दस घंटे खुले वातावरण में काम करने के लिए मजबूर होता है। इसलिए वायु प्रदूषण का बोझ समाज में समान रूप से वितरित नहीं होता। जो लोग आर्थिक रूप से सबसे कमजोर हैं, वे अक्सर प्रदूषण के सबसे अधिक संपर्क में रहते हैं। सरकार की स्वच्छ हवा नीति में इस वास्तविकता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य प्रभावों को देखते हुए यह सवाल भी जरूरी है कि शहरों में स्कूलों, अस्पतालों और संवेदनशील आबादी वाले क्षेत्रों के आसपास प्रदूषण नियंत्रण को अतिरिक्त प्राथमिकता क्यों न दी जाए। जिन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में बच्चे रहते या पढ़ते हैं, वहाँ भारी वाहनों की आवाजाही और निर्माण धूल को नियंत्रित किया जा सकता है। अस्पतालों के आसपास खुले में कचरा जलाना या निर्माण सामग्री का ढेर लगाना पूरी तरह रोका जाना चाहिए। ऐसे क्षेत्रों को “संवेदनशील क्षेत्र” मानकर अतिरिक्त निगरानी की व्यवस्था हो सकती है।

सरकारी योजनाओं की सफलता को केवल इस आधार पर नहीं मापा जाना चाहिए कि कितनी मशीनें खरीदी गईं या कितनी बार निरीक्षण हुआ। वास्तविक सवाल यह होना चाहिए कि हवा में प्रदूषण कितना कम हुआ। यदि एक नगर निगम ने दस नई मशीनें खरीद लीं, लेकिन सड़क की धूल का स्तर वही बना रहा, तो मशीनों की संख्या अपने आप में उपलब्धि नहीं है। यदि किसी निर्माण स्थल पर बीस निरीक्षण हुए, लेकिन हर निरीक्षण के बाद भी वही धूल उड़ती रही, तो निरीक्षण की संख्या से नागरिक को कोई लाभ नहीं मिला। नीति का मूल्यांकन परिणाम के आधार पर होना चाहिए।

इसी संदर्भ में स्वच्छ वायु सर्वेक्षण जैसे प्रयासों को भी देखा जाना चाहिए। शहरों के बीच बेहतर प्रदर्शन की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा उपयोगी हो सकती है। इससे नगर निकायों को अपने काम में सुधार की प्रेरणा मिलती है। लेकिन किसी शहर की रैंकिंग को उसकी हवा की अंतिम गुणवत्ता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। प्रशासनिक प्रयास और वास्तविक वायु गुणवत्ता दो अलग लेकिन जुड़े हुए मापदंड हैं। किसी शहर ने बेहतर व्यवस्था बनाई है, यह अच्छी बात है; लेकिन नागरिक का अंतिम सवाल यही रहेगा कि उसे साँस लेने के लिए कैसी हवा मिल रही है।

राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत कई शहरों में PM10 स्तरों में सुधार दर्ज किया जाना सकारात्मक संकेत है। इससे यह साबित होता है कि योजनाबद्ध प्रयासों से सुधार संभव है। लेकिन सुधार और समाधान के बीच अंतर है। यदि किसी शहर का प्रदूषण पहले से कुछ कम हुआ है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह अब पूरी तरह सुरक्षित हो गया। इसी तरह यदि किसी सर्वेक्षण में शहर की स्थिति बेहतर दिखाई देती है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उस शहर के हर मोहल्ले में हवा समान रूप से स्वच्छ है। शहर के भीतर भी प्रदूषण का स्तर सड़क, औद्योगिक क्षेत्र, आवासीय क्षेत्र और निर्माण क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रदूषण के स्रोत की पहचान के साथ उसी स्रोत पर कार्रवाई हो। यदि सड़क से धूल उठ रही है तो सड़क की स्थिति सुधारनी होगी। यदि निर्माण स्थल से धूल निकल रही है तो निर्माण स्थल को नियंत्रित करना होगा। यदि ट्रक के कारण मिट्टी सड़क पर फैल रही है तो ट्रक और निर्माण स्थल दोनों की जिम्मेदारी तय करनी होगी। यदि औद्योगिक इकाई उत्सर्जन सीमा का उल्लंघन कर रही है तो वहीं कार्रवाई करनी होगी। यदि वाहन प्रदूषण बढ़ा रहे हैं तो उत्सर्जन मानकों और सार्वजनिक परिवहन दोनों पर काम करना होगा। यही उस अखबारी चर्चा का मूल संदेश भी है कि जिस स्रोत से प्रदूषण पैदा हो रहा है, कार्रवाई का केंद्र भी वही स्रोत होना चाहिए।

सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक इच्छा और प्रशासनिक निरंतरता की है। प्रदूषण का समाधान पाँच दिन की मुहिम से नहीं होगा। सड़क की धूल सालभर पैदा होती है। निर्माण सालभर चलता है। वाहन सालभर चलते हैं। औद्योगिक गतिविधियाँ सालभर होती हैं। इसलिए कार्रवाई भी सालभर होनी चाहिए। सर्दियों में प्रदूषण बढ़ने के बाद अचानक बैठकें करने और कुछ दिनों के लिए प्रतिबंध लगाने से बेहतर है कि अप्रैल से ही अगले प्रदूषण मौसम की तैयारी शुरू कर दी जाए। जब तक संकट सामने आए, तब तक सड़कें सुधर चुकी हों, निर्माण स्थल नियंत्रित हों और निगरानी व्यवस्था सक्रिय हो।

यह भी जरूरी है कि केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों के बीच जिम्मेदारी स्पष्ट हो। दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के बीच एनसीआर की समस्या में समन्वय जरूरी है। एक शहर में की गई कार्रवाई का प्रभाव दूसरे शहर पर पड़ सकता है। इसलिए क्षेत्रीय स्तर पर साझा डेटा और संयुक्त निरीक्षण उपयोगी हो सकते हैं। यदि एक तरफ सड़क की धूल नियंत्रित की जा रही हो और दूसरी तरफ उसी क्षेत्र में खुले निर्माण या मलबे का परिवहन जारी हो, तो परिणाम कमजोर रहेगा।

आखिरकार सवाल यह नहीं है कि सरकार के पास योजनाएँ कितनी हैं। सवाल यह है कि उन योजनाओं का असर नागरिक की साँस पर कितना पड़ा है। सवाल यह नहीं कि कितने करोड़ रुपये खर्च किए गए। सवाल यह है कि क्या सड़क पर धूल कम हुई। सवाल यह नहीं कि कितने निर्माण स्थलों का निरीक्षण हुआ। सवाल यह है कि क्या निर्माण स्थल के बाहर रहने वाले लोगों को राहत मिली। सवाल यह नहीं कि कितनी बार प्रदूषण पर बैठक हुई। सवाल यह है कि अगले मौसम में प्रदूषण का स्तर कितना कम हुआ।

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