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पत्रकारिता: लोकतंत्र का चौथा स्तंभ और सुप्रीम कोर्ट की दृष्टि

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पत्रकारिता: लोकतंत्र का चौथा स्तंभ और सुप्रीम कोर्ट की दृष्टि



हमारे देश का लोकतंत्र संविधान द्वारा स्थापित तीन स्तंभों - विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका पर खड़ा है, लेकिन इन तीनों को जवाबदेह बनाए रखने वाला और जनता व सत्ता के बीच सेतु का काम करने वाला चौथा स्तंभ है - पत्रकारिता। यदि प्रेस स्वतंत्र नहीं है, तो लोकतंत्र केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाता है।


लेकिन आज पत्रकारिता अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। पत्रकारिता पर हमले अब केवल शारीरिक नहीं रहे, बल्कि बहुआयामी हो गए हैं। देशभर में शासन-प्रशासन द्वारा जिस प्रकार दमनकारी नीति से पत्रकारिता का दोहन किया जा रहा है, वह किसी से छिपा नहीं है।


सर्वोच्च न्यायालय कई अवसरों पर स्पष्ट कर चुका है कि आलोचनात्मक टिप्पणी को अपराध नहीं माना जा सकता। यह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्राप्त वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है। पत्रकारिता को स्वतंत्र रखना ही लोकतंत्र को जीवित रखना है।


*सुप्रीम कोर्ट का सुरक्षा कवच*


सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकारिता की सुरक्षा के लिए बार-बार कहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ केवल लिखने की आजादी नहीं, बल्कि उसे बिना किसी बाधा के जनता तक पहुँचाने और प्रसारित करने की आजादी भी है।


माननीय न्यायालय ने प्रमुख मामलों में इसे स्थापित किया है:


*1. बृज भूषण बनाम दिल्ली राज्य - AIR 1950 SC 129:* प्रेस की आजादी पर पहला बड़ा फैसला। कोर्ट ने कहा - "प्रेस की स्वतंत्रता पर पूर्व-प्रतिबंध (pre-censorship) लगाना अनुच्छेद 19(1)(a) का सीधा उल्लंघन है।"


*2. सकल पेपर्स बनाम भारत संघ - AIR 1962 SC 305:* सरकार द्वारा अखबारों के पन्ने और दाम तय करने की कोशिश को असंवैधानिक करार दिया।


*3. बेनेट कोलमैन बनाम भारत संघ - AIR 1973 SC 106:* कहा - "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल विचार तक सीमित नहीं, बल्कि उसके प्रसार और वितरण तक भी है।"


*4. इंडियन एक्सप्रेस बनाम भारत संघ - (1985) 1 SCC 641:* जस्टिस वेंकटरमैया ने कहा - "प्रेस सभी स्वतंत्रताओं की जननी (Mother of all liberties) है।"


*5. हिंदुस्तान टाइम्स अवमानना मामला - 2011 (10) SCR 784:* सीधे शब्दों में लिखा - "The media, be it electronic or print media, is generally called the fourth pillar of democracy."


*वर्तमान में हमलों का स्वरूप*


इसके बावजूद पिछले 12 वर्षों में हमलों का स्वरूप बदल गया है:


*क) शारीरिक और कानूनी हमला:* फील्ड में, विशेषकर जिला और तहसील स्तर पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर हमले, धमकी और एफआईआर की घटनाएं बढ़ी हैं। मानहानि और विभिन्न कानूनों का उपयोग कर खोजी पत्रकारिता को कोर्ट-कचहरी में उलझाकर उसकी आवाज दबाई जाती है। इसका परिणाम सेल्फ-सेंसरशिप है।


*ख) आर्थिक हमला:* छोटे और मझोले समाचार-पत्र विज्ञापन पर निर्भर हैं। निष्पक्ष पत्रकारिता करने पर उन्हें आर्थिक हमलों का सामना करना पड़ता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रेवेन्यू संकट और मीडिया घरानों में नौकरी की असुरक्षा पत्रकारों को समझौता करने पर मजबूर करती है।


*ग) डिजिटल हमला:* सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को प्रकाशक बना दिया है, लेकिन फेक न्यूज़, अफवाह और संगठित ट्रोलिंग ने विश्वसनीय पत्रकारिता की साख पर हमला किया है, जिसका सबसे अधिक सामना महिला पत्रकारों को करना पड़ता है।


यह दुर्भाग्य है कि आजादी के 80 साल बाद भी पत्रकारिता को संवैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं है, जबकि न्यायपालिका इसे चौथा स्तंभ मान चुकी है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए रक्षा कवच को नजरअंदाज कर देश में अघोषित आपातकाल का अहसास दिलाना, निष्पक्ष पत्रकारिता को समाप्त कर पीत-पत्रकारिता को प्रोत्साहन देने की सोची-समझी साजिश है, जो भविष्य में लोकतंत्र के लिए अभिशाप साबित होगी।


पत्रकारिता केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि एक संवैधानिक दायित्व है। जब पत्रकार स्वतंत्र, सुरक्षित और आर्थिक रूप से सशक्त होगा, तभी वह सत्ता से सवाल पूछ सकेगा और वंचितों की आवाज बन सकेगा।



 डॉ. सैयद खालिद कैस

लेखक, समीक्षक, आलोचक, पत्रकार

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