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ये कैसा युवा दिवस ..?

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व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन

आज स्वामी विवेकानंद की जयंती है। कैलेंडर में तारीख चमक रही है, मंचों पर बैनर टंगे हैं, नेताओं के भाषण तैयार हैं और सोशल मीडिया पर विवेकानंद के चुनिंदा कोट्स की बाढ़ आ चुकी है। पूरा देश “राष्ट्रीय युवा दिवस” मना रहा है। पर सवाल यह नहीं है कि युवा दिवस मनाया जा रहा है या नहीं, सवाल यह है कि ये कैसा युवा दिवस है और किसके लिए है?


विवेकानंद को आज फिर से याद किया जा रहा है, ठीक वैसे ही जैसे हर साल याद किया जाता है फोटो फ्रेम में, भाषणों में, पोस्टरों में और राजनीतिक लाभ के हिसाब से


काट-छांट कर। उनकी तस्वीर के नीचे लिखा है “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।” लेकिन मंच के सामने खड़ा युवा पूछ रहा है लक्ष्य क्या है? बेरोज़गारी, ठेके की नौकरी, या प्रतियोगी परीक्षा में बार-बार असफलता?


स्वामी विवेकानंद कोई सरकारी योजना नहीं थे, जिन्हें उद्घाटन के बाद भुला दिया जाए। वे कोई चुनावी नारा भी नहीं थे, जिसे ज़रूरत के हिसाब से दोहराया जाए। वे एक विचार थे, एक चेतावनी थे और एक आईना थे जो सत्ता, समाज और व्यक्ति तीनों को उनकी सच्चाई दिखाता था। लेकिन आज का दुर्भाग्य यह है कि सत्ता को आईना पसंद नहीं, उसे सिर्फ फ्रेम चाहिए।


विवेकानंद ने जिस युवा की कल्पना की थी, वह आत्मनिर्भर था, निर्भीक था और प्रश्न करने की क्षमता रखता था। आज का युवा आत्मनिर्भर तो दूर, आत्म-संशय में जी रहा है। वह सवाल पूछता है तो उसे देशद्रोही कहा जाता है, नौकरी मांगता है तो उसे आलसी कहा जाता है और अगर वह चुप रहे तो उसे भीड़ में गिना जाता है। ऐसे में युवा दिवस मनाने का औचित्य क्या रह जाता है?


सरकारें कहती हैं युवा देश की ताकत हैं। लेकिन यही ताकत जब नौकरी मांगती है तो लाठीचार्ज झेलती है, जब परीक्षा में घोटाले पर सवाल उठाती है तो मुकदमे झेलती है और जब पेपर लीक पर सड़कों पर उतरती है तो उसे कानून-व्यवस्था का दुश्मन बता दिया जाता है। यह कैसी ताकत है, जिसे कमजोर बनाए रखना सत्ता की मजबूरी बन गई है?


विवेकानंद ने कहा था कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाए। आज की शिक्षा व्यवस्था युवाओं को डिग्री तो दे रही है, लेकिन दिशा नहीं। कॉलेजों से निकलने वाला युवा हाथ में डिग्री और आंखों में अनिश्चित भविष्य लेकर खड़ा है। नौकरी के लिए उसे या तो सिफारिश चाहिए, या रिश्वत, या फिर किस्मत। मेहनत आज भी सूची में है, लेकिन सबसे नीचे।


राजनीतिक दल विवेकानंद को याद करते हैं, लेकिन उनकी सबसे बड़ी सीख भूल जाते हैं।चरित्र निर्माण। आज राजनीति में चरित्र नहीं, चरित्र प्रमाणपत्र बांटे जाते हैं। युवाओं को बताया जाता है कि देशभक्ति का मतलब सवाल न पूछना है। जबकि विवेकानंद ने तो कहा था कि सोचने वाला युवा ही राष्ट्र को आगे ले जाता है। सवाल यह है कि क्या आज सत्ता को सोचने वाला युवा चाहिए या सिर्फ नारे लगाने वाला?


आज के युवा दिवस पर मंचों से कहा जा रहा है युवा स्टार्टअप करें, आत्मनिर्भर बनें। लेकिन यह कोई नहीं बताता कि बिना पूंजी, बिना सुरक्षा और बिना नीति के स्टार्टअप कैसे खड़ा होगा? एक तरफ बेरोज़गारी बढ़ रही है, दूसरी तरफ सरकारी भर्तियां घट रही हैं। युवा दिवस के भाषणों में आंकड़े होते हैं, लेकिन युवाओं की थाली में खालीपन।


विवेकानंद ने युवाओं से कहा था कि डर को त्यागो। लेकिन आज का युवा डर में जी रहा है नौकरी जाने का डर, भविष्य का डर, बोलने का डर। सोशल मीडिया पर सक्रिय युवा वास्तविक जीवन में निष्क्रिय बना दिया गया है। उसे व्यस्त रखा गया है धर्म, जाति, राष्ट्रवाद और भावनात्मक नारों में। ताकि वह असली सवाल पूछने की फुर्सत न पा सके।


आज युवा दिवस पर विवेकानंद की मूर्तियों पर माल्यार्पण होगा, लेकिन उन युवाओं पर कोई नजर नहीं डालेगा जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते-करते उम्र पार कर चुके हैं। कोई उन युवाओं की बात नहीं करेगा जो पेपर लीक, भर्ती घोटालों और भ्रष्टाचार के शिकार हो गए। युवा दिवस मंच पर मनाया जा रहा है, जमीन पर नहीं।


विवेकानंद कहते थे “जिस देश में युवाओं को सम्मान नहीं मिलता, वह देश कभी महान नहीं बन सकता।” आज युवा सम्मान नहीं, सहनशीलता सिखाई जा रही है। उसे बताया जा रहा है कि हालात से समझौता करो, सिस्टम से मत टकराओ। लेकिन क्या यही विवेकानंद का भारत था?


यह भी विडंबना है कि विवेकानंद को सबसे ज्यादा वही लोग याद कर रहे हैं, जिनकी नीतियों से युवा सबसे ज्यादा परेशान है। उनके नाम पर सेमिनार होते हैं, लेकिन उनकी सोच पर अमल नहीं। उनके विचारों को चुनकर पेश किया जाता है वही विचार जो सत्ता को सूट करें।

तो आज युवा दिवस पर सवाल यह नहीं है कि विवेकानंद को याद किया गया या नहीं, सवाल यह है कि उन्हें समझा गया या नहीं? अगर विवेकानंद आज होते तो शायद वे भी पूछते ये कैसा युवा दिवस है, जहां युवा सिर्फ तस्वीरों में मुस्कुराता है और हकीकत में संघर्ष करता है?


जब तक युवा दिवस सिर्फ भाषणों, पोस्टरों और राजनीति का उत्सव बना रहेगा, तब तक यह दिन युवाओं के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था की आत्मतुष्टि के लिए मनाया जाता रहेगा। विवेकानंद को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि युवा को सोचने, सवाल पूछने और सम्मान के साथ जीने का अधिकार मिले।


वरना हर साल 12 जनवरी आएगा, जयंतियां मनेंगी, नारे लगेंगे और फिर वही सवाल हवा में तैरता रहेगा ये कैसा युवा दिवस ..?

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