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भोजशाला में गूंजे जयकारे:

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 भोजशाला में गूंजे जयकारे:

बसंत पंचमी से पहले सत्याग्रह में उमड़ा जनसैलाब, सुप्रीम कोर्ट में 22 जनवरी को अहम सुनवाई

रवीन्द्र व्यास 

 परमार वंश के महान शासक राजा भोज (11वीं शताब्दी) द्वारा निर्मित ऐतिहासिक भोजशाला जो मूल रूप से माँ वाग्देवी (सरस्वती) को समर्पित भव्य मंदिर था ,मंगलवार को नियमित सत्याग्रह का केंद्र बन गया। आगामी बसंत पंचमी (23 जनवरी) के निकट होने से श्रद्धालुओं का अपार जनसैलाब उमड़ा। हवन, पूजन और सामूहिक सुंदरकांड पाठ के बीच परिसर जय श्री राम व माँ वाग्देवी की जय के उद्घोषों से गूंज उठा।सुबह से ही हिंदू समाज के लोग भोजशाला पहुँचना शुरू हो गए। पूजन के बाद सुंदरकांड का सामूहिक पाठ हुआ, जिसमें सत्याग्रही भोजशाला की पूर्ण मुक्ति और माँ वाग्देवी प्रतिमा की पुनर्स्थापना का संकल्प दोहरा रहे थे। इस अवसर पर भाजपा जिला अध्यक्ष महंत निलेश भारती, बलाई महासंघ के मनोज परमार सहित प्रमुख पदाधिकारी व सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: मंदिर से विवाद का केंद्र

भोजशाला का इतिहास परमार गौरव से जुड़ा है। राजा भोज ने 1031 ई. में इसे सरस्वती मंदिर के रूप में स्थापित किया था , जहाँ संस्कृत विद्वानों की सभा सरस्वती मंडल आयोजित होती थी। मुगल काल में इसे क्षतिग्रस्त किया गया, लेकिन ब्रिटिश पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के 1903 सर्वे में इसे स्पष्ट रूप से वाग्देवी मंदिर घोषित किया गया। स्वतंत्र भारत में 2003 के ASI सर्वेक्षण ने भी हिंदू दावों को बल दिया, फिर भी 1990 के दशक से यहाँ हिंदू पूजा व मुस्लिम नमाज का विवाद चला आ रहा है। बसंत पंचमी पर वाग्देवी पूजा की परंपरा इसी ऐतिहासिक निरंतरता का प्रतीक है।

प्रशासन के समक्ष सुरक्षा चुनौती :_

23 जनवरी को बसंत पंचमी व शुक्रवार होने से पूजा व जुम्मा नमाज के समय में टकराव की आशंका है। प्रशासन ने भारी पुलिस बल तैनात किया है। भोजशाला मुक्ति समिति ने हिंदू समाज से अधिकतम संख्या में पहुँचने का आह्वान किया है, जो स्थिति को और जटिल बना सकता है।

सुप्रीम कोर्ट में 22 जनवरी को निर्णायक सुनवाई

हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन की याचिका जिसमें बसंत पंचमी पर सूर्योदय से सूर्यास्त तक निर्बाध पूजा की मांग की गई पर सुप्रीम कोर्ट 22 जनवरी (गुरुवार) को सुनवाई करेगा। जनमानस  की नजरें इसी पर टिकी हैं, क्योंकि यह भोजशाला के भविष्य और ऐतिहासिक न्याय का मार्ग प्रशस्त करेगा।

ASI रिपोर्ट्स के  ऐतिहासिक प्रमाण ::

1902-03 ब्रिटिश ए एस आई सर्वेक्षण भोजशाला शब्द का पहली बार जिक्र किया ।1903 में ब्रिटिश शिक्षा अधीक्षक के.के. लेले के एक रिसर्च पेपर में आया था। लेले ने बताया कि इस स्थान का संबंध 11वीं सदी के राजा भोज से है। एएसआई ने 1902 और 1903 में भोजशाला परिसर की स्थिति का आकलन किया। 

2003 ए एस आई आदेश हिंदुओं को हर मंगलवार को भोजशाला परिसर के अंदर पूजा करने की अनुमति है, जबकि मुसलमानों को हर शुक्रवार को परिसर में नमाज अदा करने की अनुमति है। एएसआई ने 7 अप्रैल 2003 को यह आदेश जारी किया। 2024 वैज्ञानिक सर्वेक्षण रिपोर्ट (2000+ पेज)एएसआई की रिपोर्ट बताती है कि भोजशाला कभी एक महत्वपूर्ण शैक्षिक केंद्र था, जिसे राजा भोज ने स्थापित किया था। बरामद कलाकृतियों से संकेत मिलता है कि वर्तमान संरचना पहले के मंदिरों के कुछ हिस्सों का उपयोग करके बनाई गई थी। मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला एक मंदिर ही है। वर्तमान संरचना (कमाल मौला दरगाह) का निर्माण करने में यहां पहले से मौजूद रहे मंदिर के ही हिस्सों का उपयोग किया गया था।सर्वे में 94 मूर्तियाँ, मूर्तिकला टुकड़े (बेसाल्ट, संगमरमर आदि से), शिलालेख व अवशेष मिले। ये उद्धरण विवाद को ऐतिहासिक प्रमाणों से जोड़ते हैं। मूल रिपोर्ट्स सार्वजनिक नहीं, लेकिन कोर्ट दस्तावेजों में उपलब्ध हैं।

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