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अयोध्या में 'राज्याभिषेक', पर लव-कुश की जन्मस्थली अब भी 'वनवास' में!

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अयोध्या में 'राज्याभिषेक', पर लव-कुश की जन्मस्थली अब भी 'वनवास' में!


शुभम् जैन अशोकनगर/करीला। एक ओर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की नगरी अयोध्या अपने भव्य स्वरूप में लौट आई है। 500 वर्षों का इंतजार खत्म हुआ और रामलला अपने दिव्य मंदिर में विराजमान हो गए। लेकिन इसी उल्लास के बीच एक टीस उस धरती की भी है, 

जहाँ प्रभु राम के उत्तराधिकारियों—लव और कुश— ने जन्म लिया था।

मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले में स्थित करीला धाम, जो माता सीता की शरणस्थली और लव-कुश की जन्मभूमि मानी जाती है, आज भी बुनियादी विकास और सरकारी तंत्र की अनदेखी का दंश झेल रही है।

श्रद्धा का सैलाब, सुविधाओं का अकाल

करीला धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। यहाँ स्थित वाल्मीकि आश्रम के बारे में मान्यता है कि माता सीता ने लोक-लाज के कारण त्याग दिए जाने के बाद यहीं आश्रय लिया था। हर साल रंगपंचमी पर यहाँ लगने वाले विश्व प्रसिद्ध मेले में 20 से 25 लाख श्रद्धालु जुटते हैं। बेड़िया समुदाय की महिलाओं द्वारा प्रस्तुत 'राई नृत्य' यहाँ की अनूठी परंपरा है, जो मन्नत पूरी होने पर लव-कुश के जन्म की खुशी में किया जाता है।

विडंबना देखिए, जिस स्थान पर लाखों की भीड़ जुटती है, वहाँ की सड़कें आज भी संकरी हैं। पेयजल की उचित व्यवस्था का अभाव है और श्रद्धालुओं के रुकने के लिए पर्याप्त धर्मशालाओं की कमी है। अयोध्या के कायाकल्प ने जहाँ वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर अपनी जगह बनाई है, वहीं करीला आज भी एक अदद 'मास्टर प्लान' की बाट जोह रहा है।

अयोध्या सा विकास क्यों नहीं?

स्थानीय निवासियों का कहना है कि जब अयोध्या को विश्वस्तरीय बुनियादी ढाँचा मिल सकता है, तो लव-कुश की जन्मस्थली को क्यों भुला दिया गया?

  कनेक्टिविटी: मुंगावली और अशोकनगर से करीला तक पहुँचने वाले मार्ग आज भी खस्ताहाल हैं।

 पर्यटन सर्किट: इसे 'राम-पथ' या 'सीता-पथ' जैसे किसी बड़े धार्मिक कॉरिडोर से नहीं जोड़ा गया।

 सुरक्षा और प्रबंधन: भारी भीड़ के दौरान यहाँ अक्सर अव्यवस्था का माहौल रहता है, क्योंकि स्थायी पुलिस चौकी और चिकित्सा केंद्र का ढांचा बेहद कमजोर है।

आस्था की पुकार: अब तो सुध ले सरकार

करीला धाम के महंत और स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि सरकार इसे 'धार्मिक पर्यटन केंद्र' के रूप में विकसित करे, तो यह क्षेत्र न केवल रोजगार का केंद्र बनेगा, बल्कि रामायण कालीन इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को भी संजीवनी मिलेगी।

 "पिता की नगरी सज गई, यह सौभाग्य है। लेकिन पुत्रों की जन्मभूमि और माता सीता के संघर्ष की साक्षी यह भूमि उपेक्षित क्यों है? क्या लव-कुश की जन्मस्थली को आधुनिक सुविधाओं का अधिकार नहीं?" — एक स्थानीय श्रद्धालु

अयोध्या का विकास गौरव की बात है, लेकिन श्री राम का परिवार तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक लव-कुश का जिक्र न हो। अगर समय रहते शासन-प्रशासन ने करीला धाम की सुध नहीं ली, तो यह ऐतिहासिक धरोहर केवल मेलों तक सिमट कर रह जाएगी। वक्त आ गया है कि 'राम राज्य' की अवधारणा को अयोध्या की सीमाओं से बाहर निकालकर करीला जैसे उन पवित्र स्थानों तक पहुँचाया जाए, जो आज भी अपने अस्तित्व और विकास के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

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