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सागर का सच जब जीवनदायिनी झील बन जाए केवल दृश्य सजावट

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 बुंदेलखंड की डायरी सागर का सच जब जीवनदायिनी झील बन जाए केवल दृश्य सजावट

रवीन्द्र व्यास 

मध्य प्रदेश का हृदय कहे जाने वाले सागर की पहचान केवल उसके शैक्षणिक, सांस्कृतिक या राजनीतिक योगदान से नहीं, बल्कि उस जल-संरचना से भी है जिसने इस शहर को जन्म दिया। विडंबना यह है कि जिस जल ने सागर को “सागर” बनाया, वह आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। शहर के मध्य स्थित लाखा बंजारा झील आज एक गंभीर प्रश्न बनकर खड़ी है ,क्या हम अपनी विरासत को केवल सजाने तक सीमित कर देंगे, या उसे बचाने का साहस भी दिखाएंगे?

इतिहास की सीख, वर्तमान की अनदेखी

सदियों पहले जब यह क्षेत्र बियाबान और जल-विहीन था, तब लाखा बंजारा ने एक जलाशय का निर्माण कर न केवल पानी रोका, बल्कि सभ्यता की नींव रखी। यह झील केवल एक तालाब नहीं थी, यह सागर के सामाजिक-आर्थिक जीवन की धुरी थी। पीढ़ियों तक इसी जल से शहर की प्यास बुझी, घरों की रसोई चली और जीवन की लय बनी रही।

करीब 350  वर्ष पहले का यह इलाका  कठोर पहाड़ियों, लाल पत्थरों और घने जंगलों से भरा था। जल स्रोतों का अभाव इतना गंभीर था कि यहां स्थायी बसाहट की कल्पना भी कठिन थी। 16वीं शताब्दी के व्यापारी लाखा बंजारा ने प्राकृतिक जल प्रवाह (जो आगे चलकर कढ़ान नदी से जुड़ता था) को रोककर एक विशाल तालाब का निर्माण कराया।यह तालाब केवल जल संचयन नहीं था, बल्कि मानव बसाहट का आधार बना | इसके बाद गढ़पहरा शासकों ने किला बनवाया धीरे-धीरे यह क्षेत्र एक शहर में परिवर्तित हो गया | 

लेकिन आधुनिक विकास की दौड़ में यह ऐतिहासिक चेतना कहीं खो गई। नल-जल योजनाओं के विस्तार ने जहां सुविधा दी, वहीं इस प्राकृतिक स्रोत से जुड़ाव को कमजोर कर दिया। परिणामस्वरूप, झील के प्रति जिम्मेदारी भी घटती गई।

विकास का भ्रम और पर्यावरणीय क्षरण

आज झील के सौंदर्यीकरण पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। रोशनी, पाथवे और पर्यटन सुविधाओं ने इसे आकर्षक बना दिया है, लेकिन मूल सवाल वहीं है क्या पानी साफ हुआ? क्या झील फिर से जीवनदायिनी बन पाई?

सागर शहर पहाड़ियों से घिरा एक प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्र है वर्षा का पानी इन पहाड़ियों से बहकर झील में एकत्र होता था यह जल साल भर धीरे-धीरे नालों झरने के रूप में बहता रहता था इस व्यवस्था ने झील को प्राकृतिक  वाटर रिचार्ज सिस्टम बना दिया था।

 1950 के दशक तक  शहर की पीने के पानी की जरूरत इसी झील से पूरी होती थी घरेलू उपयोग,खाना बनाना, धुलाई, पशुपालन सब इसी पर निर्भर जल की गुणवत्ता इतनी अच्छी थी कि दाल पकने  को गुणवत्ता का पैमाना माना जाता था |  यह झील सागर की जीवनदायिनी मानी जाती थी ।

 आज  हकीकत यह है कि शहर के नालों का गंदा पानी अब भी झील में गिर रहा है। अतिक्रमण ने उसके जलग्रहण क्षेत्र को सिकोड़ दिया है। जिन पहाड़ियों से वर्षा जल झील में आता था, वे अब कंक्रीट के जंगल में बदल चुकी हैं। यह स्थिति केवल एक झील की नहीं, बल्कि हमारी विकास नीति की कमी को उजागर करती है, जहां दिखावे को प्राथमिकता दी जाती है।

पर्यावरणीय चेतावनी

लाखा बंजारा झील का संकट केवल जल प्रदूषण तक सीमित नहीं है। यह एक व्यापक पर्यावरणीय संकट का संकेत है । जिसके कारण,भूजल स्तर में गिरावट देखी जा रही है,जैव विविधता का क्षरण हो रहा है वह अलग । शहर का बढ़ता  तापमान अपनी कहानी खुद बयान करती है।यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो सागर जैसे शहरों में जल संकट और गहराएगा, और भविष्य में महंगे प्रोजेक्ट भी इस कमी की भरपाई नहीं कर पाएंगे।

 देखा जाए तो यह केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, यह समाज की  भी जिम्मेदारी है।इस संकट का समाधान केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है। आवश्यकता है बहुस्तरीय प्रयास की ।

जैसे बिना शोधन के कोई भी नाला झील में न गिरे ।अतिक्रमण पर सख्ती हो जलग्रहण क्षेत्र को  मुक्त किया जाए ।पारंपरिक जलधाराओं , पुराने नाले, झरने और जलमार्ग फिर से सक्रिय किए जाएं। साथ ही नागरिकों को झील संरक्षण का सहभागी बनाया जाए।

सौंदर्य बनाम वास्तविकता

हाल के वर्षों में लगभग 100 करोड़ रुपये की लागत से झील का सौंदर्यीकरण किया गया, इसका एक सकारात्मक पक्ष भी रहा है , झील के तट पर और क्रूज के सफर से  पर्यटन का  आकर्षण जरूर बढ़ गया , इससे शहर की इमेज बेहतर हुई , आसपास का क्षेत्र भी विकसित हुआ | 

कुछ मुद्दों को लेकर  गंभीर सवाल अब भी खड़े हैं ,क्या जल गुणवत्ता सुधरी?क्या सीवेज ट्रीटमेंट की स्थायी व्यवस्था हुई?क्या अतिक्रमण हटाया गया?अधिकांश मामलों में जवाब आंशिक या नकारात्मक है।


दरअसल   सागर की पहचान उसके नाम से नहीं, उसके जल से है। यदि लाखा बंजारा झील केवल एक टूरिस्ट स्पॉट बनकर रह गई, तो यह न केवल इतिहास के साथ अन्याय होगा, बल्कि भविष्य के साथ भी एक गंभीर खिलवाड़ होगा।


अभी भी  समय है जब सागर को अपने अतीत से सीख लेकर भविष्य की दिशा तय करनी होगी। वरना वह दिन दूर नहीं जब सागर  केवल नक्शे पर एक नाम रह जाएगा बिना पानी, बिना पहचान के।

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