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पुस्तक समीक्षा ------------- "अंतर्मन का उद्घोष" श्रीमती शशि दीप

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 पुस्तक समीक्षा 

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"अंतर्मन का उद्घोष"

श्रीमती शशि दीप



श्रीमती शशि दीप द्वारा रचित पुस्तक 'अंतर्मन का उद्घोष' की प्रति प्राप्त होने पर उसे विस्तार से पढ़ने का अवसर मिला। श्रीमती शशि दीप एक द्विभाषी लेखिका और विचारक के रूप में जानी जाती हैं। वर्तमान में, वे प्रेस क्लब ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स संगठन के महासचिव पद पर कार्यरत हैं। गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों को निभाते हुए उनके द्वारा किया गया यह कार्य निश्चित रूप से सराहनीय है। इस पुस्तक को उन्होंने अपनी पूज्य माता को समर्पित किया है जिसमें तिरसठ विभिन्न लेखों का संग्रह है। साहित्य की दुनिया में लेखक के मन के उद्गारों को प्रकट करने का एक माध्यम होता है। श्रीमती शशि दीप की पुस्तक 'अंतर्मन का उद्घोष' में शीर्षक के अनुरूप उनके अंतर्मन की गहरी भावनाएं समाहित हैं। पुस्तक का मुखपृष्ठ अत्यंत आकर्षक है, और मुद्रण कार्य भी उच्च स्तर का है।

                                

 प्रारंभ के लेखों में गणेश जी की महिमा और उनकी प्रतिमा निर्माण तथा विसर्जन का उल्लेख है। किसी भी शुभ कार्य के प्रारंभ में गणपति बप्पा का स्मरण किया जाता है, जिसे लेखिका ने शामिल किया है। पर्यावरण संरक्षण के लिए यह आवश्यक है कि हम मूर्ति निर्माण में ऐसी सामग्री का उपयोग करें जो जल में घुलनशील हो और हानिकारक न हो। प्लास्टर ऑफ पेरिस और रसायनों से निर्मित मूर्तियां जल में घुल नहीं पाती और जानवरों के लिए हानिकारक हो सकती हैं। इसलिए मूर्ति विसर्जन बहुत ही सोच-समझकर और सम्मानजनक तरीके से करना चाहिए। मिट्टी की मूर्तियां जल में बैठ जाती हैं और जलाशयों को नुकसान नहीं पहुंचाती।


 "आधुनिक युग में पुरुषत्व के हावी भाव से नारी का आहत मन " इस लेख में नारियों की मानसिक पीड़ा का वर्णन है। सार्वजनिक स्थानों पर नारियों को सम्मान देना चाहिए व उन्हें पर्याप्त अवसर भी मिलना चाहिए। परिवार के सभी सदस्यों को एक दूसरे की भावनाओं को समझना चाहिए तभी समन्वय स्थापित हो सकता है। समाज को नारियों के प्रति दृष्टिकोण बदलना होगा। "साहित्यिक पत्रकारिता, स्वतंत्र पत्रकारिता का सुरक्षित तरीका " इस लेख में साहित्यिक पत्रकारिता के बारे में बतलाया गया है। सामाजिक कुरीतियों अथवा भ्रष्टाचार के विरोध में लिखने के लिए लेखनी प्रखर होनी चाहिए ,तभी वह प्रभावोत्पादक होगी। लेखनी का प्रभाव सकारात्मक होना चाहिए। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लोकमान्य बालगंगाधर तिलक व कांग्रेस के गर्म दल के नेताओं की लेखनी ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध आक्रोश उत्पन्न करती थी। लेखनी का प्रभाव नकारात्मक नहीं होना चाहिए। साहित्यिक पत्रकारिता लोगों को समझा बुझाकर प्रेरित करती है।


सभी लेख अपने आप में अनूठे हैं। इन्हें पढ़कर पाठकों को सुखद अनुभूति होगी व ज्ञानार्जन भी होगा। दैनिक जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान भी पुस्तक में समाहित है। मैं लेखिका श्रीमती शशि दीप जी को शुभकामनाएं देते हुए पुस्तक के लोकप्रिय होने की कामना करता हूं। 

                                   

डॉ सत्येन्द्र कुमार तिवारी

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)

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