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बुंदेलखंड में सिंचाई परियोजनाएं: खेतों तक पानी पहुंचा, लेकिन गांवों से छिन गई जमीन, जंगल और पहचान

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बुंदेलखंड में सिंचाई परियोजनाएं: खेतों तक पानी पहुंचा, लेकिन गांवों से छिन गई जमीन, जंगल और पहचान

बुंदेलखंड की डायरी 

रवीन्द्र व्यास 

बुंदेलखंड दशकों से सूखा, जल संकट और पलायन की त्रासदी झेलता रहा है। यहां की धरती पर पानी हमेशा राजनीति, विकास और संघर्ष का केंद्र रहा है। इसी संकट से निपटने के लिए सरकारें लगातार बड़ी सिंचाई परियोजनाओं का निर्माण कर रही हैं। कागजों पर ये योजनाएं लाखों किसानों की जिंदगी बदलने का दावा करती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह भी है कि इन्हीं परियोजनाओं की कीमत हजारों ग्रामीण अपने घर, खेत, जंगल, संस्कृति और सामाजिक पहचान और सामाजिक ताना बाना खोकर चुका रहे हैं।

मध्य प्रदेश के सागर जिले में उल्दन बांध ,बंडा वृहद सिंचाई परियोजना,  और सतगढ़-कढ़ान मध्यम सिंचाई परियोजना, केन बेतवा लिंक परियोजना और पन्ना जिले की दो सिंचाई परियोनाये  इस विरोधाभास की सबसे ताजा मिसाल बनकर सामने आई हैं। एक ओर सरकार इन्हें क्षेत्र की तस्वीर बदलने वाली योजनाएं बता रही है, वहीं दूसरी ओर सलैया खुर्द और खानपुर जैसे गांवों के लोग अपने ही हाथों से अपने घर गिराने को मजबूर हैं।

विकास का वादा: सूखे बुंदेलखंड को पानी देने का प्रयास 

बुंदेलखंड की पहचान लंबे समय तक सूखा, फसल बर्बादी और किसान पलायन से जुड़ी रही है। ऐसे में बंडा वृहद सिंचाई परियोजना को क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण जल परियोजनाओं में गिना जा रहा है।करीब 3219 करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना से बंडा, शाहगढ़, मालथौन और छतरपुर जिले की बकस्वाहा तहसील सहित लगभग 80 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई का लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा 412 गांवों की पेयजल आपूर्ति तथा औद्योगिक उपयोग के लिए भी पानी सुरक्षित रखा गया है।

सरकार का दावा है कि  यह परियोजना बुंदेलखंड के कृषि भविष्य को बदलने वाली पहल है। लेकिन जिस पानी से लाखों खेतों को हरियाली मिलने वाली है, उसी पानी में कुछ गांवों का अस्तित्व डूब रहा है।

सलैया खुर्द  जहां लोग अपने हाथों से गिरा रहे हैं सपनों का घर उल्दन बांध से मात्र डेढ़ किलोमीटर दूर स्थित सलैया खुर्द पूरी तरह डूब क्षेत्र में आ गया है।बारिश शुरू होने से पहले प्रशासन गांव को खाली कराने में जुटा है। सरकारी भवन पहले ही ध्वस्त किए जा चुके हैं। अब ग्रामीण अपने मकानों की ईंटें, दरवाजे और छतों के सामान निकाल रहे हैं।यह सिर्फ मकानों का टूटना नहीं है। यह उन यादों का बिखरना है, जो पीढ़ियों से गांव की गलियों, खेतों और चौपालों में बसती रही हैं।गांव की महिलाओं की आंखों में सबसे अधिक पीड़ा दिखाई देती है। जिन घरों में उन्होंने शादी के बाद जीवन बिताया, जिन आंगनों में बच्चों को बड़ा किया, उन्हें अब छोड़ना पड़ रहा है।

ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें उनकी जमीन के बदले पर्याप्त मुआवजा नहीं मिला। कई परिवार जमीन के बदले जमीन की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि पुनर्वास स्थल पर मकान बनाकर नहीं दिए गए, बल्कि केवल आर्थिक सहायता देकर स्वयं निर्माण करने को कहा गया है।

पुनर्वास की चुनौती: सिर्फ जमीन नहीं, आजीविका भी छिनती है

विस्थापन का सबसे बड़ा संकट केवल घर बदलना नहीं होता, बल्कि पूरी सामाजिक और आर्थिक संरचना का टूट जाना होता है।सागर जिले का खानपुर गांव इसका उदाहरण है।सतगढ़-कढ़ान मध्यम सिंचाई परियोजना के कारण यह आदिवासी बहुल गांव पूरी तरह खाली हो गया। गांव के लोगों को सलेरा पुनर्वास कॉलोनी में बसाया गया, लेकिन वहां जीवन की बुनियादी सुविधाएं आज भी अधूरी हैं।ग्रामीण बताते हैं कि पीने के लिए स्वच्छ पानी नहीं है।बिजली कनेक्शन अधूरे हैं।सड़कें कच्ची हैं।रोजगार के अवसर नहीं हैं।जंगल और प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच खत्म हो गई है।

खानपुर के अधिकांश सौंर आदिवासी परिवारों की आजीविका जंगल पर निर्भर थी। वे लकड़ी, जड़ी-बूटियां और मजदूरी के जरिए जीवन चलाते थे। पुनर्वास कॉलोनी में उनके सामने रोजगार का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

बुंदेलखंड में बढ़ता विकास बनाम विस्थापन का संघर्ष

बुंदेलखंड में यह पहला मामला नहीं है।इससे पहले भी,राजघाट बांध,माताटीला बांध,बरियारपुर बांध,केन-बेतवा लिंक परियोजना आदि जैसी योजनाओं के कारण हजारों परिवार प्रभावित हुए हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में विकास परियोजनाओं के कारण होने वाले विस्थापन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि मुआवजा अक्सर भूमि या संपत्ति के आर्थिक मूल्य तक सीमित रह जाता है, जबकि सामाजिक और सांस्कृतिक नुकसान का आकलन नहीं किया जाता।

एक किसान के लिए खेत केवल संपत्ति नहीं होता, बल्कि उसकी पहचान, सुरक्षा और भविष्य का आधार होता है। आदिवासी समुदायों के लिए जंगल केवल संसाधन नहीं बल्कि जीवन और संस्कृति का हिस्सा होता है।

क्या केवल मुआवजा पर्याप्त है?

भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास कानून प्रभावित परिवारों को मुआवजा, पुनर्वास और पुनर्स्थापन के अधिकार देता है। लेकिन जमीनी स्तर पर सबसे बड़ी शिकायत यही रहती है कि पुनर्वास को केवल नकद भुगतान तक सीमित कर दिया जाता है।विशेषज्ञों के अनुसार प्रभावी पुनर्वास के लिए जरूरी है कि जमीन के बदले जमीन का विकल्प प्राथमिकता बने।पुनर्वास स्थल पर पहले से आवास और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों।विस्थापितों के लिए स्थायी रोजगार योजना बनाई जाए।सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्वास को भी योजना का हिस्सा बनाया जाए।परियोजना लाभार्थियों और विस्थापितों के बीच न्यायपूर्ण संतुलन स्थापित किया जाए।

जल संकट का समाधान, लेकिन सामाजिक कीमत कितनी?

बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र में सिंचाई परियोजनाओं की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। जलवायु परिवर्तन, घटते भूजल स्तर और लगातार बढ़ती गर्मी के बीच बड़े जलाशय कृषि और पेयजल सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास का मॉडल ऐसा हो सकता है जिसमें कुछ गांवों का अस्तित्व मिटाकर दूसरों को पानी दिया जाए?

सिचाई परियोजनाओं के कारण विस्थापित हो रहे  ग्रामीण इसी सवाल को उठा  रहे हैं।जब कोई गांव डूबता है तो केवल मकान नहीं डूबते। उसके साथ इतिहास, स्मृतियां, रिश्ते, परंपराएं और स्थानीय संस्कृति भी जलमग्न हो जाती हैं।

   दरअसल  बुंदेलखंड की सिंचाई परियोजनाएं एक कठिन सच्चाई को उजागर करती हैं। एक तरफ लाखों किसानों के लिए पानी, सिंचाई और विकास का सपना है, दूसरी तरफ हजारों विस्थापित परिवारों की अनिश्चितता, बेरोजगारी और पहचान का संकट।विकास की सफलता केवल बांधों की ऊंचाई या सिंचित क्षेत्र के आंकड़ों से नहीं मापी जा सकती। उसकी वास्तविक कसौटी यह होगी कि जिन लोगों ने अपने गांव, जमीन और जीवन की कीमत चुकाई है, क्या उन्हें सम्मानजनक पुनर्वास और बेहतर भविष्य मिल पाया या नहीं।बुंदेलखंड के डूबते गांव आज इसी सवाल का जवाब मांग रहे हैं।

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