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लोकतांत्रिक व्यवस्था के नाम पर प्रेस की स्वतंत्रता पर आघात चिंतनीय: प्रेस क्लब ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स

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 लोकतांत्रिक व्यवस्था के नाम पर प्रेस की स्वतंत्रता पर आघात चिंतनीय: प्रेस क्लब ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स

मुंबई।पत्रकार सुरक्षा एवं कल्याण के लिए प्रतिबद्ध अखिल भारतीय संगठन 'प्रेस क्लब ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (पंजीकृत)' ने दिल्ली उच्च न्यायालय के एक ऐतिहासिक फैसले का स्वागत किया है। न्यायालय द्वारा न्यूज़ क्लिक (NewsClick) संस्थान और वहां के पत्रकारों के खिलाफ केंद्र सरकार के संस्थानों द्वारा दर्ज प्राथमिकी (FIR) को रद्द करने के फैसले को संगठन ने निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए एक बड़ा रक्षा कवच बताया है।

सत्ता द्वारा आवाज़ दबाने का प्रयास: डॉ. सैयद खालिद कैस

संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉक्टर सैयद खालिद कैस (एडवोकेट)** द्वारा जारी एक आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि:

> "NewsClick न्यूज पोर्टल द्वारा जनता की आवाज़ को मज़बूती से उठाने, नई दिल्ली में किसानों के विरोध प्रदर्शन पर लगातार निष्पक्ष रिपोर्टिंग करने और सत्ता में बैठे लोगों से तीखे सवाल पूछने के कारण उन्हें निशाना बनाया गया। सत्ताधारी व्यवस्था ने पोर्टल की आवाज़ को दबाने के लिए झूठे आरोपों के आधार पर मामले दर्ज किए।"

विज्ञप्ति में आगे बताया गया कि दिल्ली पुलिस की इकोनॉमिक ऑफ़ेंस विंग (EOW) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) जैसी केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल कर न्यूज़ पोर्टल और उसके एडिटर-इन-चीफ़ प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) जैसे कठोर कानूनों का इस्तेमाल किया गया। उन्हें गैर-कानूनी तरीके से गिरफ़्तार किया गया और कुछ अन्य पत्रकारों को भी जेल भेजा गया, जो पूरी तरह निंदनीय था।

 राष्ट्रपति महोदया को सौंपा गया था ज्ञापन

प्रेस क्लब ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स ने सरकार के इस दमनात्मक कृत्य के खिलाफ पुरजोर आवाज़ उठाई थी। निष्पक्ष पत्रकारिता पर हो रहे लगातार हमलों के प्रति गहरी चिंता व्यक्त करते हुए, संगठन ने पूर्व में **महामहिम राष्ट्रपति महोदया** को एक ज्ञापन सौंपकर इस मामले में न्याय की मांग की थी।

न्यायालय के फैसले और संवैधानिक अधिकार

प्रेस विज्ञप्ति में सुप्रीम कोर्ट के पिछले महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया गया है कि सरकार या उसकी नीतियों की आलोचना करना कोई अपराध या देशद्रोह नहीं है:

 अभिषेक उपाध्याय मामला (अक्टूबर 2025): सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पत्रकारों को उनके काम के लिए प्रताड़ित नहीं किया जा सकता।

 आर्टिकल 370 से जुड़ा मामला (मार्च 2024):न्यायालय ने दोहराया था कि असहमति का अधिकार लोकतंत्र का हिस्सा है।

> संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a)

> न्यायालयों ने अपने विभिन्न फैसलों में **'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' (Freedom of Speech)** का हवाला देते हुए कहा है कि लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना कोई अपराध नहीं, बल्कि यह एक जीवंत लोकतंत्र की आत्मा है। हर नागरिक को केंद्र या राज्य सरकार के फैसलों से असहमत होने और कानूनी दायरे में रहकर विरोध दर्ज कराने का पूरा अधिकार है।


प्रेस क्लब ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स ने अंत में जोर देकर कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की आड़ में केंद्रीय एजेंसियों द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता पर इस तरह के आघात करना बेहद चिंतनीय हैं। दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला उन ताकतों के खिलाफ एक करारा जवाब है जो मीडिया की स्वतंत्र आवाज़ को कुचलना चाहती हैं।


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