लेखक: डॉ. सैयद खालिद कैस, एडवोकेट
समीक्षक, आलोचक, पत्रकार
भारत सरकार और चुनाव आयोग भले ही मतदाता सूची के 'विशेष गहन संशोधन' (SIR) को एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बता कर अपनी पीठ थपथपा रहे हों, लेकिन इस प्रक्रिया की गूंज अब सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रही। इसकी आंच अब अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच चुकी है।
*संयुक्त राष्ट्र के 3 स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों* ने *1 मई 2026* को भारत सरकार को एक औपचारिक पत्र लिखकर SIR प्रक्रिया पर गहरी चिंता व्यक्त की है और 60 दिनों के भीतर विस्तृत जवाब मांगा है।
UN विशेषज्ञों की यह रिपोर्ट भारत सरकार के दावों की पोल खोलती है। यह साफ संकेत है कि दुनिया SIR प्रक्रिया को सिर्फ "शुद्धिकरण" नहीं, बल्कि *संभावित भेदभावपूर्ण अभियान* के रूप में देख रही है। UN ने सरकार से कहा है कि वह *तुरंत अंतरिम कदम उठाए* ताकि किसी पात्र मतदाता को 2026 के विधानसभा चुनावों में मतदान से बाहर न रखा जाए। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को तुरंत पारदर्शिता बरतनी होगी और यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी धर्म, जाति या भाषा के आधार पर किसी नागरिक को उसके संवैधानिक अधिकार से वंचित न किया जाए।
मतदाता सूची के 'विशेष गहन संशोधन' SIR के नाम पर हुए पक्षपात पर UN विशेषज्ञों के मुख्य आरोप इस प्रकार हैं।विशेषज्ञों के अनुसार 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में *लगभग 5.18 करोड़ से अधिक नाम* मतदाता सूची से हटाए गए हैं। अकेले *पश्चिम बंगाल में 89 लाख* और *उत्तर प्रदेश में 2.89 करोड़* नाम हटने की बात सामने आई है।
रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि इस कदम से अल्पसंख्यक टारगेटिंग का खतरा बढ़ा है। केंद्रीय गृह मंत्री सहित सरकारी अधिकारियों द्वारा इसे "गैर-कानूनी बांग्लादेशी घुसपैठियों" को टारगेट करने वाला अभियान बताया गया। UN ने कहा कि इस तरह की बयानबाजी से भारतीय मुस्लिम नागरिकों को विदेशी नागरिकों के साथ मिला दिया गया है। इसे "डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट" की नीति कहा गया। रिपोर्ट में AI और अपारदर्शिता पर भी प्रश्नचिन्ह लगाया है। कहा गया कि मतदाता सत्यापन के लिए इस्तेमाल किए जा रहे अपारदर्शी AI-संचालित मॉडल के कारण अल्पसंख्यकों के नाम बड़े पैमाने पर प्रभावित हुए हैं। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी के नाम पर दादा के नाम की स्पेलिंग अलग होने पर पूरे परिवार को फ्लैग किया गया। निर्वाचन आयोग का यह कदम अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है। UN ने कहा कि यह प्रक्रिया *ICCPR के अनुच्छेद 25 वोट के अधिकार, और अनुच्छेद 27 अल्पसंख्यक अधिकारों का उल्लंघन कर सकती है। साथ ही यह ICERD के तहत भारत की जिम्मेदारियों के खिलाफ भी जा सकती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह भेदभाव का बोझ बढ़ा है।कम समय सीमा, दस्तावेजों की जटिलता और आर्थिक-भाषाई रूप से पिछड़े समुदायों के लिए दावा-आपत्ति की प्रक्रिया में रुकावटें, वोट के अधिकार पर "बेवजह की रोक" लगा सकती हैं।
UN विशेषज्ञों के अनुसार आंकड़े कितने भयावह हैं।यदि देखा जाए तो राष्ट्रीय स्तर पर 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 5.18 करोड़ से 6.08 करोड़ नाम हटाए गए हैं। ये उन क्षेत्रों के कुल मतदाताओं का 10.2% है। SIR की शुरुआत बिहार राज्य से हुई है। बिहार में 24 जून 2025 को पायलट प्रोजेक्ट लॉन्च किया गया । शुरुआती चरण में ही 65 लाख नाम हटाए गए। विपक्ष और 23 राजनीतिक दलों ने सुप्रीम कोर्ट को संयुक्त पत्र लिखकर SIR को "लोकतंत्र पर हमला" बताया था। बिहार के बाद मध्य प्रदेश में यह कुचक्र चला। मध्य प्रदेश भी उन 19 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में है जहां SIR प्रक्रिया अभी चल रही है। गुजरात में 68 लाख नाम हटे, जो MP से सटा है और यहां भी समान पैटर्न की आशंका है। AI आधारित "लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी" से आदिवासी और मुस्लिम बहुल इलाकों में नाम काटे जाने की शिकायतें आई है । SIR प्रक्रिया से प्रभावित अन्य बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में 2.05 करोड़ से 2.89 करोड़ नाम हटे तथा 13.21% कमी आई। पश्चिम बंगाल में 83.86 लाख से 89 लाख नाम हटे जिसके कारण 10.9%* कमी आई।पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में अकेले 4.5 लाख नोटिस दिए गए हैं ।तमिलनाडु में 74 लाख नाम हटे जिसके आधार पर 11.5% कमी आई।
संयुक्त राष्ट्र UN की 5 सबसे बड़ी चिंताएं जो सामने आई हैं।उनमें भेदभावपूर्ण बयानबाजी ,"डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट" की नीति से भारतीय मुस्लिमों को "घुसपैठिया" बताया गया। UN ने इसे ICCPR Art 20(2) के तहत धार्मिक नफरत फैलाना बताया। AI का काला बॉक्स भी इसका ज़िम्मेदार है। "दादा के नाम की स्पेलिंग अलग" या "मां-बेटे की उम्र का अंतर" जैसी छोटी गलती पर पूरा परिवार काट दिया गया। पारदर्शिता शून्य नजर आई है। अल्पसंख्यक विशेषकर मुस्लिम समाज के संवैधानिक अधिकारों पर चोट की गई है।ICCPR Art 25 वोट का अधिकार और Art 27 अल्पसंख्यक अधिकार का उल्लेख किया गया है । ICERD के तहत भारत की जिम्मेदारी का उल्लंघन किया गया है।मतदाता सूची के 'विशेष गहन संशोधन' - SIR में 30-45 दिन की समय सीमा में गरीब, प्रवासी मजदूर और कम पढ़े-लिखे लोग पुराने 2001के दस्तावेज कैसे जुटाएंगे इस पर भी चिंता जताई गई है।चुनाव आयोग ने 2001के दस्तावेज के आधार पर देश के लाखों लोगों को सूची से हटाया है। निर्वाचन आयोग के इस आत्मघाती कदम पर चिंता जताते हुए UN ने देश भर में सूची में से हटाए गए लोगों का धर्म और जाति आधारित डेटा मांगा है। UN विशेषज्ञों की इस रिपोर्ट से बचाओ में सरकार और कोर्ट ने अपना अपना जवाब रखा ।भारत निर्वाचन आयोग ने जहां कहा कि कोई पात्र नहीं छूटेगा। दावा-आपत्ति के लिए फॉर्म 6,7,8 के माध्यम से रास्ते खुले हैं। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि SIR "कानूनी रूप से मान्य है लेकिन साथ में यह भी कहा कि "नाम कटने से नागरिकता नहीं जाती"। इस रिपोर्ट के प्रकाश में आने के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक हाई-लेवल पैनल बनाया जो SIR के बहिष्कार का अध्ययन कर रहा है।
बिहार से शुरू होकर MP तक पहुंचा ये अभियान अब *राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दा* बन चुका है। UN की चेतावनी साफ है - *2026 के चुनाव से पहले* यह सुनिश्चित किया जाए कि कोई भी पात्र मतदाता, खासकर अल्पसंख्यक, मतदान से वंचित न रहे। भारत की लोकतांत्रिक साख दांव पर है। चुनाव आयोग को पारदर्शिता और जवाबदेही दिखानी होगी।
UN ने सरकार से कहा है कि वह *तुरंत अंतरिम कदम उठाए* ताकि किसी पात्र मतदाता को 2026 के विधानसभा चुनावों में मतदान से बाहर न रखा जाए। UN के विशेषज्ञों ने भारत सरकार से 7 बिंदुओं पर जानकारी मांगी है। सबसे अहम हटाए गए लोगों का जाति और धर्म के आधार पर अलग-अलग डेटा मांगा है साथ ही अगर डेटा उपलब्ध नहीं है तो इसका कारण बताने को कहा है। संयुक्त राष्ट्र के आरोपों पर भारत ने भी अपना पक्ष रखा है। इन आरोपों पर अपना बचाओ करते हुए चुनाव आयोग का कहना है कि SIR का उद्देश्य "कोई पात्र न छूटे, कोई अयोग्य न जुड़े" है। सुप्रीम कोर्ट ने भी SIR को "कानूनी रूप से मान्य" ठहराया है और कहा है कि नाम हटने का मतलब नागरिकता समाप्त नहीं होती। लेकिन सवाल यह है कि क्या एक प्रशासनिक प्रक्रिया के नाम पर लोकतंत्र की नींव - सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार - से खिलवाड़ किया जा सकता है?










