कल सम्पूर्ण राष्ट्र देश की आजादी की 80 वीं वर्षगांठ हर्षौल्लास के साथ मनाएगा। लाल किले के प्राचीर से प्रधानमंत्री देश के नाम संदेश प्रचारित करेंगे। आजादी के इस अस्सी साल के सफर में हमने बहुत कुछ खोया बहुत कुछ पाया।आज देश उन्नतशील देश की भांति विश्व धरा पर अपनी मौजूदगी को बखूबी दर्ज करा रहा है यह एक शुभ संकेत है। लेकिन इस आजादी के लिए इसकी बुनियाद को अपने खून से सींचने वालों को हम आज भी भुलाए बैठे हैं।आज इस पूर्व संध्या पर हम अतीत के झरोखे से उन यादों को एक बार फिर ताजा कर लेते हैं। चलिए हम चलते है आज से 80साल पहले के भारत में। हम याद करते हैं देश का पहला स्वतंत्रता दिवस। याद करते हैं प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और देश के लिए उनके योगदान को। आजादी से पहले से लेकर आज आजादी को हासिल करने के 79साल बाद भी एक चीज आज भी नहीं बदली वह है लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पत्रकारिता की हालत। एक तरफ हम आजादी के 79 साल बाद 2026 में चंद्रयान, UPI, G-20 और स्टार्टअप की बात करते हैं। तिरंगा चांद पर है, इंटरनेट हर गांव में है, और मीडिया का डिजिटलाइजेशन हो गया है। पर इसी 79 साल में लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ "पत्रकारिता" की हालत क्या हुई?
क्या वाकई आज के समय में पत्रकारिता आजाद है? इस सवाल का जवाब जितना कड़वा है, उतना ही जरूरी है। क्योंकि जब तक कलम गुलाम रहेगी, तब तक लोकतंत्र भी अधूरा रहेगा। आजादी की लड़ाई में पत्रकारिता सबसे आगे थी। "युगांतर", "केसरी", "हरिजन" जैसी पत्रिकाओं ने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी थी। तिलक जेल गए, गांधी ने "यंग इंडिया" से क्रांति की। उस समय पत्रकारिता ही देशभक्ति थी। लेकिन आज यह परिभाषा बदल चुकी है। जो नहीं बदला वह है शासनतंत्र द्वारा पत्रकारिता का दोहन। तब अंग्रेज़ों ने हमारी आवाज को दबाया अब सत्ता पक्ष दबा रहा है।
यदि हम पत्रकारिता के इतिहास में जायें तो पाएंगे कि 1990 के बाद पत्रकारिता के क्षेत्र में उदारीकरण आया। प्राइवेट चैनल, 24x7 न्यूज, सोशल मीडिया समाज का एक अभिन्न अंग बन गया। खबरिया चैनलों के कारण सूचना का विस्फोट हुआ। पर इसी विस्फोट में "सूचना" और "प्रोपेगंडा" का फर्क मिट गया।आज हमारे पास 900+ न्यूज चैनल, लाखों यूट्यूब चैनल, करोड़ों फेसबुक पेज हैं। पर सवाल पूछने वाले कितने हैं? सच दिखाने वाले कितने हैं? यदि हम इस पर मंथन करें तो पाएंगे जिसने सच उजागर करने का प्रयास किया उसका दोहन हुआ, उसको शोषण का सामना करना पड़ा। 2000के बाद जैसे जैसे हम डिजीटल मीडिया की तरफ मजबूत हुए वैसे वैसे प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर कारपोरेट जगत का प्रभुत्व बढ़ने लगा जिसका परिणाम यह हुआ कि आज मीडिया जगत कार्पोरेट जगत की बेड़ियों में जकड़ चुका है। कार्पोरेट जगत की बेड़ियां जो आज पत्रकारिता के पैरों में हैं उसने पत्रकारिता को आर्थिक गुलामी अर्थात विज्ञापन की राजनीति का गुलाम बना डाला है। आज मीडिया हाउस चलता है विज्ञापन से। सरकार का विज्ञापन, कॉरपोरेट का विज्ञापन। आर्थिक गुलामी अर्थात विज्ञापन की राजनीति ने सच का दोहन किया और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहीं न कहीं इनके हाथों लहू लोहान हो गया। अब खबर का छपना इस बात पर आश्रित है कि इससे क्या और कितना आर्थिक फायदा होगा। सच या झूठ सिर्फ आर्थिक फायदे पर आधारित हो गया है। आर्थिक व्यवस्था के कारण सच उजागर करने वाले छोटे अखबार और पोर्टल की हालत और अधिक खराब हो गई। मीडिया संस्थान तो दूर छोटे अखबार और पोर्टल यदि महीने में 50 हजार का विज्ञापन न आए तो स्टाफ की सैलरी तक देना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में छोटे अखबार और पोर्टल का संपादक रिपोर्टर से कहता है "सरकार के खिलाफ मत लिखो, विज्ञापन रुक जाएगा"। अर्थात विज्ञापन की लालसा के कारण सच को जाहिर करना मुश्किल हो रहा है। बिना आर्थिक व्यवस्था के छोटे अखबार और पोर्टल दम तोड़ रहे हैं ।मजबूरन उनको चन्दा या आर्थिक सहायता के लिए अपने उसूलो से समझौता करना पड़ता है और यही सच को जाहिर करना बेमानी हो जाता है। छोटे अखबार और पोर्टल का संपादक और रिपोर्टर अपने परिवार को पालने के लिए इस सच से समझौता कर लेते हैं कि आर्थिक गुलामी ही उनको बेहतर कल उपलब्ध करा सकते हैं।
निष्पक्ष पत्रकारिता की राह का दूसरा सबसे बड़ा रोड़ा राजनीतिक दबाव है जिसमें किस से क्या पूछना है क्या नहीं सत्ता के खिलाफ सवाल पूछो तो देशद्रोही बना दिया जाता। पहले पत्रकार को "जनता की आवाज" कहा जाता था। पर आज सवाल पूछने वाले को "टुकड़े-टुकड़े गैंग", "पेड", "बिकाऊ" और न जाने क्या क्या कहा जाता है। पहले पत्रकार जो चाहते थे सवाल करते थे, लेकिन अब प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूछे जाने वाले सवाल पहले से तय होते हैं, इंटरव्यू में स्क्रिप्ट पहले से बनाई हुई होती है। यदि कोई पत्रकार अपने ज़मीर को जिंदा कर सत्ता विरोधी सवाल पूछ लेता है तो सोशल मीडिया पर ट्रोल आर्मी उसका जीना मुश्किल कर देती है यही नहीं सरकार की जांच एजेंसियों IT, ED के शिकंजे, मानहानि के मुकदमों का सामना करना पड़ जाता है। भोपाल का एक रिपोर्टर अगर भ्रष्टाचार लिख दे तो अगली सुबह थाने से नोटिस। मुंबई का एंकर अगर सत्ता के खिलाफ बोले तो चैनल से बाहर। ये अभिव्यक्ति की आजादी है या नया इमरजेंसी?
निष्पक्ष पत्रकारिता की राह का तीसरा सबसे बड़ा रोड़ा कॉरपोरेट जगत का अत्यधिक दखल और TRP बढ़ाने का दबाव है। मीडिया घरानों को खबर नहीं, मसाला चाहिए ताकि उनके चैनल्स को खूब TRP मिले, उनको राजस्व की खूब प्राप्ति हो। आज खबर की कीमत सच या झूठ से नहीं उसकी TRP से तय होती है। बलात्कार, हत्या, अफेयर, सेलिब्रिटी की शादी आज की पत्रकारिता में ये सब ही बिकता है। किसान की आत्महत्या, मजदूर की समस्या, शिक्षा-स्वास्थ्य से इनको कोई सरोकार नहीं इनकी नजर में ये "बोरिंग" विषय है। इससे न तो इनको राजस्व प्राप्त होगा और न ही इससे TRP मिलेगी न ही इस तरह की खबरों से विज्ञापन मिलते हैं। मीडिया मालिक अपने मातहत प्रबंधन से सीधा कहता है "ये खबर नहीं चलेगी, व्यूज नहीं आएंगे"। ऐसी स्थिति में पत्रकार के पास 2 ऑप्शन ही होते है या तो वह नौकरी बचाए, या सिद्धांतों की आहुति दे डाले। अपने घर परिवार को चलाने, अपने जीवन की सुरक्षा के मद्देनजर ऐसे में 90% पत्रकार अपनी नौकरी बचाने को प्राथमिकता देते हैं। इसके नतीजा गंभीर होते हैं और स्वतंत्र पत्रकारिता मर जाती है।
निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए मीडिया चैनल्स यू ट्यूब, न्यूज पोर्टल्स में भारी संख्या में फर्जी पत्रकारों का कब्जा भी अशुभ संकेत है। पत्रकारिता की आड़ में फर्जी पत्रकार निष्पक्ष पत्रकारिता के किसी शत्रु से कम नहीं आंके जा सकते हैं। जो कल तक प्रॉपर्टी डीलर थे, आज वह "क्राइम रिपोर्टर" बन गए। जो वसूली करते हैं, ब्लैकमेल करते हैं, और पकड़े जाने पर कहते हैं "मैं पत्रकार हूं"। चाय नाश्ते का ठेला लगाने वाले, ऑटो मैकेनिक, ऑटो चलाने वाले, और न जाने कौन कौन से पेशे वाले पत्रकार का कार्ड जैब में रखे मिल जाते हैं। नतीजा क्या निकलता है कि असली श्रमजीवी पत्रकार उनके कारण बदनाम हो जाते हैं । शासन प्रशासन की नज़र में मुट्ठी भर फर्जी पत्रकारों के कारण निष्पक्ष पत्रकारिता बदनाम हो रही हैं। यहाँ तक के कुछ फर्जी लोग संगठनों में पदाधिकारी तक बन बैठे हैं।
आजादी की 80 वीं सालगिरह के अवसर पर अब दूसरी आजादी की लड़ाई आरम्भ करनी होगी। 79 साल पहले हमने अंग्रेजों से आजादी मांगी थी। आज हमें विज्ञापन से आजादी,सत्ता से आजादी,फर्जी लोगों से आजादी,TRP से आजादी, और डर से आजादी, राजनैतिक हस्तक्षेप से आजादी।जब तक पत्रकार आजाद नहीं होगा, तब तक न किसान की आवाज उठेगी, न मजदूर का दर्द, न आम आदमी का न्याय।महात्मा गांधी ने कहा था "स्वतंत्रता का अर्थ है जिम्मेदारी"। आज पत्रकारों को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। सच लिखना होगा, चाहे कुछ भी हो जाए। कलम बिकाऊ नहीं, कलमकार बिकाऊ नहीं। यही हमारा मंत्र है। यही हमारी लड़ाई है। आइए इस 15 अगस्त पर संकल्प लें - "पत्रकारिता को आजाद कराएंगे, तभी देश वाकई आजाद होगा"।
जय हिंद। जय पत्रकारिता। जय संविधान।
डॉ. सैयद खालिद कैस, एडवोकेट
समीक्षक, आलोचक, पत्रकार।










