डॉक्टर सैयद खालिद कैस एडवोकेट
लेखक/समीक्षक/आलोचक/ पत्रकार
केंद्र की मोदी सरकार हमेशा ऐसे मुद्दे लेकर आ रही है जिन पर अलोकतांत्रिक होने के आरोप लगते हैं ,चाहे वह किसान आंदोलन हो या नीट पेपर लीक मामले में जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलनकारियों के साथ मानव अधिकार विरोधी कदम उठाना हो या फिर संघ के बक्से में से निकला वंदे मातरम बिल।
केंद्र सरकार के द्वारा वंदे मातरम बिल लाकर एक बार फिर मुसलमानों को सरकार के विरोध के लिए लामबंद कर दिया ।सरकार वर्षों से जानती थी कि वंदे मातरम बिल को मुसलमान कभी स्वीकार नहीं करेंगे इसी कारण तानाशाही के साथ इस बिल को थोप दिया गया। गौर तलब हो कि केंद्र सरकार ने 2026 में "वंदे मातरम" को लेकर 2 बड़े कदम लिए हैं, और इसी पर मुस्लिम संगठनों ने आपत्ति जताई है।
सरकार ने पहले कहा कि सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों-कॉलेजों में अब वंदे मातरम` के सभी 6 छंद गाए जाएंगे, और इसे `जन गण मन` से पहले गाया जाएगा। साथ ही इसके सम्मान में खड़े होना भी जरूरी होगा। यह कदम उठाने के बाद भी सरकार को लगा कि इससे भी मुसलमान परेशान नहीं होंगे तो वंदे मातरम बिल जुलाई 2026 सदन में पेश कर दिया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मानसून सत्र में बिल पेश कर दिया। इसके तहत `वंदे मातरम का अपमान करना या गायन में बाधा डालना दंडनीय अपराध` बन गया। सरकार का तर्क है कि इसे `जन गण मन` जैसा ही कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए। मालूम हो कि मोदी कैबिनेट ने पहले ही वंदे मातरम को `राष्ट्रगान के समान दर्जा` देने का फैसला ले लिया था।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत उलेमा ए हिंद ने इसका विरोध किया है। उनका मुख्य मुख्य तर्क है कि इस बिल से सरकार ने धार्मिक आघात किया है। बोर्ड का कहना है कि वंदे मातरम के कुछ छंदों में `दुर्गा और अन्य देवताओं की वंदना` है। इस्लाम में सिर्फ `अल्लाह की इबादत` है और `शिर्क` मना है। इसलिए सभी 6 छंद पढ़ना उनकी आस्था के खिलाफ है। वही इसके कानूनी आधार को भी विरोध का कारण माना जा रहा है ।ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत उलेमा ए हिंद द्वारा इसे असंवैधानिक` और `धार्मिक स्वतंत्रता के विपरीत` बताया गया है। इसे संविधान के अनुच्छेद 25 और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लंघन कहा गया है। विरोध का तीसरा कारण इसका ऐतिहासिक आधार है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का कहना है कि रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह और संविधान सभा में तय हुआ था कि सिर्फ `पहले 2 छंद` ही आधिकारिक रूप से गाए जाएंगे। बोर्ड ने चेतावनी भी दी है कि अगर सरकार फैसला वापस नहीं लेती तो वो कोर्ट जाएंगे। जमीयत उलेमा ए हिंद का मानना है कि ये `ज़बरदस्ती थोपा गया फैसला है, एक धर्म की मान्यता दूसरे पर थोपना है और अल्पसंख्यकों के अधिकार छीनने का प्रयास है।
वहीं इसके समर्थन में सरकार का कहना है कि यह राष्ट्रीय सम्मान से जुड़ा मामला है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भी कहा था कि वंदे मातरम को जन गण मन के समान सम्मान मिलना चाहिए, लेकिन कानूनी प्रावधान नहीं था - यह बिल उसी कमी को दूर करेगा। सरकार का यह भी तर्क है कि ये राष्ट्रीय एकता और सम्मान का प्रतीक है, और इसे कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए।
वंदे मातरम बिल के नाम पर सरकार द्वारा लाए गए कानून" राष्ट्र गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026" को संसद की मंजूरी मिल चुकी है. इस कानून के तहत राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम को राष्ट्रगान जन गण मन का दर्जा दिया गया है. इस विधेयक में राष्ट्रीय गीत और राष्ट्र गान के अपमान पर 3 साल की सजा का प्रावधान है. ऐसे में सवाल यह है कि अगर कोई मुस्लिम व्यक्ति द्वारा राष्ट्रीय गीत नहीं गाना अपमान की श्रेणी में आएगा क्या? इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने 1986 एक ऐतिहासिक फैसला दिया था.
राष्ट्र गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 को संसद से मंजूरी मिल चुकी है. इसमें राष्ट्रगीत वंदे मातरम के गायन के दौरान किसी भी तरह के व्यवधान या उसके अपमान को आपराधिक कृत्य मानते हुए तीन साल तक की सजा का प्रावधान किया गया है. सरकार ने कहा कि यह विधेयक वंदे मातरम को कानून के तहत राष्ट्रगान जन गण मन के बराबर का दर्जा देता है, क्योंकि इसमें राष्ट्रगान गाने से जानबूझकर रोकने या किसी सभा में इसके गायन में व्यवधान पैदा करने पर लगने वाले दंडात्मक प्रावधानों को राष्ट्रीय गीत पर भी लागू किया गया है. लेकिन, सुप्रीम कोर्ट का एक अहम आदेश है जिसमें कहा गया है कि किसी व्यक्ति द्वारा राष्ट्र गान जन गण मन का गायन नहीं करना उसका अपमान नहीं है. ऐसे में क्या था वह फैसला और क्या कोई मुस्लिम व्यक्ति अगर वंदे मातरम का गायन न करे तो भी उसे अपमान नहीं माना जाएगा? आज इन्हीं सवालों का जवाब खोजने की कोशिश करते हैं.
वंदे मातरम गीत आजादी की लड़ाई का प्रतीक रहा है, लेकिन इसके कुछ हिस्सों को लेकर दशकों से धार्मिक और संवैधानिक चर्चा भी होती रही है. अब जब संसद ने राष्ट्र गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 को मंजूरी दे दी है, तब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल वंदे मातरम नहीं गाना भी अपराध माना जाएगा? इस सवाल का जवाब समझने के लिए पहले सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले को समझना जरूरी है।
साल 1986 में बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तीन स्कूली बच्चों के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला दिया था, ये बच्चे ईसाई समुदाय के जेहोवा विटनेस संप्रदाय से थे. उनका धार्मिक विश्वास था कि वे ईश्वर के अलावा किसी और की स्तुति नहीं कर सकते. इसी वजह से वे स्कूल की प्रार्थना सभा में राष्ट्रगान जन गण मन नहीं गाते थे. हालांकि, वे राष्ट्रगान शुरू होते ही सम्मानपूर्वक खड़े हो जाते थे. उन्होंने कभी शोर नहीं मचाया, विरोध नहीं किया और न ही किसी दूसरे छात्र को राष्ट्रगान गाने से रोका. फिर भी उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि राष्ट्रगान नहीं गाना और राष्ट्रगान का अपमान करना दो अलग-अलग बातें हैं. अदालत ने माना कि यदि कोई व्यक्ति अपने वास्तविक धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाता, लेकिन सम्मानपूर्वक खड़ा रहता है और किसी तरह का व्यवधान नहीं पैदा करता, तो उसे अपराधी नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता का हिस्सा है, यहीं अदालत ने यह भी कहा था कि बोलने की स्वतंत्रता में चुप रहने का अधिकार भी शामिल है. सुप्रीम कोर्ट यही फैसला कई मामलों के लिए नजीर है। राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान को अब बराबर का दर्जा प्राप्त है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट कह चुका है राष्ट्रगान का अपमान करना अपराध है. किसी धार्मिक विश्वास के कारण गान नहीं गाना अपमान नहीं है।
मुस्लिम समुदाय का एक वर्ग पूरे वंदे मातरम का गायन धार्मिक आधार पर नहीं करता. इसकी वजह राजनीतिक नहीं, बल्कि धार्मिक व्याख्या है. वंदे मातरम के शुरुआती दो अंतरों में भारत की धरती, प्रकृति और समृद्धि का वर्णन है. लेकिन बाद के अंतरों में भारत माता की तुलना दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे देवी स्वरूपों से की गई है. इस्लाम का मूल सिद्धांत तौहीद यानी एकेश्वरवाद है. कई इस्लामी विद्वानों का मानना है कि अल्लाह के अलावा किसी अन्य की वंदना करना इस्लामी मान्यताओं के अनुरूप नहीं है. इसी कारण कुछ मुस्लिम संगठन और धार्मिक संस्थान पूरे गीत का गायन नहीं करते. हालांकि अनेक मुसलमान पहले दो अंतरे गाते हैं और कई इसे देशभक्ति का गीत मानकर पूरा भी गाते हैं. इसलिए पूरे समुदाय की एक जैसी राय नहीं है।
संसद से पारित संशोधन का उद्देश्य वंदे मातरम का अपमान रोकना है. कानून के अनुसार यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रगीत के गायन में बाधा डालता है, उसे रोकता है या उसका अपमान करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है. लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर है. अपमान और गायन से परहेज एक ही बात नहीं हैं. अगर कोई व्यक्ति कार्यक्रम में हंगामा करता है, गीत का मजाक उड़ाता है, दूसरों को गाने से रोकता है या जानबूझकर व्यवधान पैदा करता है, तो मामला कानून के दायरे में आ सकता है. लेकिन यदि कोई व्यक्ति अपने धार्मिक विश्वास के कारण स्वयं गीत नहीं गाता, सम्मानपूर्वक खड़ा रहता है और किसी तरह की बाधा नहीं डालता, तो स्थिति अलग होगी।जिसे अपमान की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है।मुसलमानों ने वंदे मातरम का कभी अपमान नहीं किया और न करेंगे।इसलिए सरकार मुसलमान को इस कानून के नाम पर आतंकित नहीं कर सकती।










