लेखक लवप्रीत सिह
भारतीय संविधान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसने समानता और सामाजिक न्याय, दोनों को एक साथ लेकर चलने का प्रयास किया है। संविधान निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि एक ऐसे समाज में, जहाँ सदियों से सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक असमानताएँ गहरी जड़ें जमा चुकी थीं, वहाँ केवल औपचारिक समानता की घोषणा कर देना पर्याप्त नहीं होगा। यदि राज्य केवल यह कह दे कि सभी नागरिक कानून के समक्ष समान हैं, तो उससे उन वर्गों की वास्तविक स्थिति नहीं बदलती जो ऐतिहासिक रूप से शिक्षा, रोजगार, भूमि, संसाधनों और सामाजिक सम्मान से वंचित रहे हैं। इसी कारण संविधान में समानता के अधिकार के साथ-साथ ऐसे प्रावधान भी किए गए जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा बाद में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए विशेष उपायों की अनुमति देते हैं। यही वह संवैधानिक दर्शन है जिसमें अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 का जन्म हुआ।
आज जब आरक्षण की अवधि, उसकी संवैधानिक वैधता और उसके भविष्य को लेकर बहस होती है, तब एक प्रश्न बार-बार सामने आता है कि क्या अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 के अंतर्गत दिए गए आरक्षण पर कोई समय-सीमा निर्धारित है। बहुत से लोग अनुच्छेद 334 का उल्लेख करते हैं और यह मान लेते हैं कि जैसे संसद और विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों की अवधि संविधान में समय-समय पर बढ़ाई जाती रही है, उसी प्रकार शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण भी किसी निश्चित अवधि के लिए होगा। यह धारणा संवैधानिक दृष्टि से सही नहीं है। अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 में कहीं भी ऐसी कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है कि आरक्षण दस वर्ष, बीस वर्ष या किसी अन्य निश्चित अवधि के बाद स्वतः समाप्त हो जाएगा। यही तथ्य इस पूरे संवैधानिक विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण आधार है।
संविधान का अनुच्छेद 14 सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण का अधिकार देता है। किंतु संविधान निर्माताओं ने यह भी समझा कि समानता का अर्थ यह नहीं है कि असमान परिस्थितियों में रहने वाले लोगों के साथ बिल्कुल एक जैसा व्यवहार किया जाए। यदि दो व्यक्तियों में से एक को सदियों तक शिक्षा से वंचित रखा गया हो और दूसरे को पीढ़ियों से शिक्षा, संपत्ति और सामाजिक अवसर प्राप्त रहे हों, तो दोनों को केवल समान अवसर की घोषणा कर देना वास्तविक समानता नहीं होगी। इसी विचार को ध्यान में रखते हुए अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 में ऐसे प्रावधान किए गए जो राज्य को विशेष प्रावधान बनाने की शक्ति देते हैं। यह शक्ति अनिवार्य नहीं है, बल्कि सक्षम बनाने वाली शक्ति है। अर्थात राज्य परिस्थितियों के अनुसार आरक्षण या अन्य विशेष उपाय कर सकता है, किंतु संविधान उसे ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं करता। इसीलिए न्यायालयों ने बार-बार कहा है कि ये प्रावधान “एनैबलिंग प्रोविजन” हैं।
अनुच्छेद 15 मूल रूप से धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान आदि के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। किंतु बाद में प्रथम संविधान संशोधन के माध्यम से अनुच्छेद 15(4) जोड़ा गया, जिसने राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के उत्थान के लिए विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति दी। बाद में अनुच्छेद 15(5) और अनुच्छेद 15(6) भी जोड़े गए, जिनके माध्यम से शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए विशेष प्रावधान का संवैधानिक आधार तैयार हुआ। यदि संविधान निर्माताओं या बाद के संशोधनकर्ताओं का उद्देश्य आरक्षण को किसी निश्चित अवधि तक सीमित करना होता, तो वे अनुच्छेद 15 में स्पष्ट समय-सीमा का उल्लेख कर सकते थे। किंतु ऐसा नहीं किया गया।
इसी प्रकार अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर की बात करता है। अनुच्छेद 16(4) राज्य को यह शक्ति देता है कि वह ऐसे पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था कर सके जो राज्य की सेवाओं में पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व नहीं रखते हैं। बाद में अनुच्छेद 16(4A), 16(4B) और 16(6) के माध्यम से पदोन्नति में आरक्षण, कैरी फॉरवर्ड रिक्तियों तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया। इन प्रावधानों में भी कहीं यह नहीं कहा गया कि आरक्षण एक निश्चित अवधि के बाद समाप्त हो जाएगा। इसका कारण यह है कि संविधान ने आरक्षण को समय से अधिक परिस्थितियों से जोड़ा है। जब तक सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन तथा अपर्याप्त प्रतिनिधित्व जैसी परिस्थितियाँ विद्यमान हैं, तब तक राज्य इन प्रावधानों का उपयोग कर सकता है।
यहाँ अनुच्छेद 334 और अनुच्छेद 15-16 के बीच का अंतर समझना आवश्यक है। अनुच्छेद 334 संसद और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण तथा एंग्लो-इंडियन समुदाय के नामित प्रतिनिधित्व की अवधि से संबंधित था। मूल संविधान में यह अवधि दस वर्ष के लिए निर्धारित की गई थी। बाद में विभिन्न संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से इसे बार-बार बढ़ाया गया और वर्तमान में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए राजनीतिक आरक्षण की अवधि आगे तक विस्तारित की गई है। इसका अर्थ यह है कि संविधान ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संदर्भ में समय-सीमा निर्धारित की थी, किंतु शिक्षा और रोजगार के आरक्षण के संदर्भ में ऐसी कोई सीमा नहीं रखी। यह अंतर आकस्मिक नहीं है, बल्कि संवैधानिक नीति का परिणाम है।
सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक निर्णयों में अनुच्छेद 15 और 16 की प्रकृति को स्पष्ट किया है। इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) का निर्णय भारतीय आरक्षण कानून का आधार स्तंभ माना जाता है। इस निर्णय में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 16(4) एक सक्षम बनाने वाला प्रावधान है और राज्य को पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण देने की शक्ति प्रदान करता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि आरक्षण का उद्देश्य समानता के सिद्धांत को कमजोर करना नहीं, बल्कि वास्तविक समानता स्थापित करना है। इसी निर्णय में सामान्यतः 50 प्रतिशत की सीमा का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया, यद्यपि बाद के निर्णयों और विशेष परिस्थितियों में इस सिद्धांत पर भी व्यापक बहस हुई है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इंद्रा साहनी के निर्णय में न्यायालय ने कहीं यह नहीं कहा कि आरक्षण केवल सीमित वर्षों तक ही दिया जा सकता है। न्यायालय का ध्यान इस बात पर था कि आरक्षण संवैधानिक उद्देश्यों के अनुरूप हो, मनमाना न हो और सामाजिक न्याय तथा समानता के बीच संतुलन बनाए रखे।
बाद में एम. नागराज बनाम भारत संघ (2006) में सर्वोच्च न्यायालय ने पदोन्नति में आरक्षण के प्रश्न पर विचार किया। न्यायालय ने कहा कि राज्य यदि अनुच्छेद 16(4A) के अंतर्गत पदोन्नति में आरक्षण देना चाहता है, तो उसे यह दिखाना होगा कि संबंधित वर्ग का प्रतिनिधित्व अपर्याप्त है और प्रशासनिक दक्षता पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा। इस निर्णय ने यह स्पष्ट किया कि आरक्षण एक निरपेक्ष अधिकार नहीं है, बल्कि संवैधानिक शर्तों के अधीन है। राज्य को अपने निर्णय का आधार वस्तुनिष्ठ आँकड़ों पर रखना होगा। किंतु यहाँ भी न्यायालय ने कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की। उसने केवल यह कहा कि आरक्षण का निर्णय तथ्यात्मक और संवैधानिक आधार पर होना चाहिए।
जर्नैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता (2018) में सर्वोच्च न्यायालय ने नागराज निर्णय के कुछ पहलुओं में संशोधन किया और कहा कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की पिछड़ेपन को पुनः सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। फिर भी अपर्याप्त प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक दक्षता जैसे तत्व महत्वपूर्ण बने रहे। इस निर्णय से भी यही सिद्धांत निकलता है कि आरक्षण की वैधता समय-सीमा से नहीं, बल्कि संवैधानिक औचित्य से जुड़ी है।
आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए किए गए 103वें संविधान संशोधन को सर्वोच्च न्यायालय ने जनहित अभियान बनाम भारत संघ (2022) में वैध माना। इस निर्णय ने यह स्वीकार किया कि संविधान सामाजिक न्याय के विभिन्न आयामों को ध्यान में रखते हुए सकारात्मक भेदभाव की व्यवस्था कर सकता है। इससे भी यह स्पष्ट होता है कि अनुच्छेद 15 और 16 के अंतर्गत आरक्षण की संवैधानिक संरचना समय-सीमा पर आधारित नहीं है।
हालाँकि यह कहना भी सही नहीं होगा कि आरक्षण अनिवार्य रूप से बिना किसी समीक्षा के हमेशा चलता रहेगा। संविधान और न्यायपालिका दोनों ने यह संकेत दिया है कि आरक्षण की नीति का समय-समय पर मूल्यांकन होना चाहिए। यदि कोई वर्ग अब पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व प्राप्त कर चुका है या उसकी सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया है, तो राज्य उस संबंध में समीक्षा कर सकता है। यही कारण है कि न्यायालयों ने आँकड़ों, प्रतिनिधित्व और संवैधानिक औचित्य पर बल दिया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि आरक्षण स्वतः समाप्त हो जाएगा, बल्कि यह कि राज्य को अपनी नीतियों का तर्कसंगत आधार बनाए रखना होगा।
आरक्षण के विरोध और समर्थन में अनेक तर्क दिए जाते हैं। विरोध करने वाले कहते हैं कि लंबे समय तक आरक्षण जारी रहने से योग्यता प्रभावित होती है और समान अवसर का सिद्धांत कमजोर होता है। समर्थन करने वाले कहते हैं कि सामाजिक भेदभाव और संरचनात्मक असमानता अभी भी समाप्त नहीं हुई है, इसलिए आरक्षण की आवश्यकता बनी हुई है। संविधान इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है। अनुच्छेद 14, 15 और 16 को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक समग्र संवैधानिक ढाँचे के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। समानता का अधिकार और सामाजिक न्याय का उद्देश्य परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
यदि संवैधानिक दृष्टि से निष्कर्ष निकाला जाए, तो यह स्पष्ट है कि अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 के अंतर्गत आरक्षण पर कोई निश्चित समय-सीमा नहीं है। अनुच्छेद 334 में राजनीतिक आरक्षण के लिए समय-सीमा का प्रावधान था, किंतु शिक्षा और सरकारी रोजगार के आरक्षण के लिए संविधान ने ऐसी कोई सीमा निर्धारित नहीं की। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय भी यही बताते हैं कि आरक्षण की वैधता उसकी अवधि पर नहीं, बल्कि उसके संवैधानिक औचित्य, सामाजिक आवश्यकता, अपर्याप्त प्रतिनिधित्व और राज्य द्वारा किए गए तर्कसंगत मूल्यांकन पर निर्भर करती है। इसलिए यह कहना कि अनुच्छेद 15 और 16 के अंतर्गत आरक्षण केवल कुछ वर्षों के लिए था और अब उसे स्वतः समाप्त हो जाना चाहिए, संविधान के पाठ, उसकी संरचना और न्यायिक व्याख्या – तीनों के अनुरूप नहीं है। भारतीय संविधान ने आरक्षण को समय की घड़ी से नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की आवश्यकता से जोड़ा है, और यही उसकी सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक विशेषता है।










