लेखक लवप्रीत सिंह
भारतीय राजनीति में कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका उत्तर तत्काल नहीं दिया जा सकता। वे समय की धूल, संघर्ष की तपिश और इतिहास की कठोर परीक्षा से गुजरने के बाद ही अपना वास्तविक स्वरूप प्राप्त करते हैं। आज जब संसद का एक और सत्र समाप्त हुआ है, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप अपने चरम पर हैं, और राहुल गांधी तथा भारतीय जनता पार्टी के बीच शब्दों का संघर्ष लगातार तीखा होता जा रहा है, तब एक विचार बार-बार मन में उठता है कि क्या राहुल गांधी भारतीय राजनीति में केवल एक विपक्षी नेता हैं, या वे धीरे-धीरे उस नैतिक राजनीति की ओर बढ़ रहे हैं जिसकी परिकल्पना महात्मा गांधी ने की थी? यह प्रश्न किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध का नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के चरित्र का प्रश्न है। हाल के दिनों में राहुल गांधी ने जिस प्रकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के विरुद्ध अपना संघर्ष जारी रखने की घोषणा की, जिस तरह उन्होंने लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संविधान और जनता की आवाज़ को केंद्र में रखा, उससे यह स्पष्ट हुआ कि वे अपनी राजनीति को केवल चुनावी गणित तक सीमित नहीं रखना चाहते। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने उन पर तीखे हमले किए, उन्हें अपरिपक्व, गैर-जिम्मेदार और यहाँ तक कि एक असफल हास्य कलाकार तक कह दिया। भारतीय राजनीति में ऐसी भाषा अब सामान्य हो चुकी है, लेकिन इस शोरगुल के बीच एक गंभीर प्रश्न दब जाता है कि क्या राजनीति का अंतिम लक्ष्य केवल सत्ता है, या सत्ता से ऊपर भी कोई नैतिक उद्देश्य हो सकता है?
महात्मा गांधी ने कभी सत्ता को अपना लक्ष्य नहीं बनाया। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया, करोड़ों भारतीयों को संगठित किया, अंग्रेज़ी साम्राज्य को चुनौती दी, लेकिन उन्होंने न प्रधानमंत्री बनने की इच्छा प्रकट की, न किसी संवैधानिक पद को स्वीकार किया। उनके लिए राजनीति समाज की आत्मा को जागृत करने का माध्यम थी। सत्य, अहिंसा, त्याग, आत्मसंयम और जनसेवा उनके राजनीतिक जीवन के आधार थे। उन्होंने बार-बार कहा कि साधन और साध्य दोनों पवित्र होने चाहिए। यदि सत्ता प्राप्त करने के लिए नैतिकता का परित्याग करना पड़े, तो ऐसी सत्ता अंततः समाज को खोखला कर देती है। आज की राजनीति में यह विचार असामान्य लगता है। चुनाव जीतना, सरकार बनाना, विरोधियों को परास्त करना और सत्ता पर नियंत्रण बनाए रखना ही राजनीति की सफलता का मानक बन गया है। ऐसे समय में यदि कोई नेता लगातार संविधान, सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक अधिकारों और जनसंवाद की बात करता है, तो उसकी राजनीति का मूल्यांकन केवल चुनावी परिणामों से नहीं किया जा सकता।
राहुल गांधी के राजनीतिक जीवन को यदि ध्यान से देखा जाए तो उसमें एक स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देता है। प्रारंभिक वर्षों में उन्हें एक अनिश्चित, संकोची और सीमित प्रभाव वाले नेता के रूप में देखा जाता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने जिस प्रकार लंबी पदयात्राएँ कीं, देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर लोगों से संवाद किया, किसानों, मजदूरों, छात्रों, महिलाओं और वंचित वर्गों की समस्याओं को सुना, उससे उनकी राजनीति का स्वर बदलता हुआ दिखाई देता है। पदयात्रा भारतीय राजनीति में केवल एक अभियान नहीं होती; वह सत्ता की दूरी को कम करने का प्रयास भी होती है। महात्मा गांधी ने दांडी यात्रा के माध्यम से यही किया था। वे जनता के बीच गए, पैदल चले, लोगों के दुख-सुख को अपना बनाया और राजनीति को जनता के जीवन से जोड़ा।
राहुल गांधी की यात्राएँ महात्मा गांधी की यात्राओं के समान नहीं कही जा सकतीं, क्योंकि इतिहास की परिस्थितियाँ अलग हैं, लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि उन्होंने जनता के बीच जाने की उस परंपरा को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जिसे आधुनिक राजनीति ने काफी हद तक छोड़ दिया था। वे मंचों से अधिक सड़कों पर दिखाई दिए। उन्होंने सुरक्षा और औपचारिकता की सीमाओं से बाहर निकलकर लोगों से सीधा संवाद करने की कोशिश की। यह शैली भारतीय राजनीति में असामान्य अवश्य है।
संसद सत्र के बाद उनके वक्तव्यों में भी संघर्ष का स्वर प्रमुख रहा। उन्होंने कहा कि वे तब तक पीछे नहीं हटेंगे जब तक वे उस व्यवस्था को चुनौती नहीं दे देते जिसे वे लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए खतरा मानते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि देश में दो प्रकार की शक्तियों के बीच संघर्ष चल रहा है—एक वह जो आदेश देना चाहती है और दूसरी वह जो अपनी बात कहना चाहती है। इस प्रकार की भाषा सत्ता परिवर्तन की भाषा नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की भाषा प्रतीत होती है। यही कारण है कि कुछ लोगों को उसमें गांधीवादी प्रतिरोध की झलक दिखाई देती है।
लेकिन किसी भी नेता की तुलना महात्मा गांधी से करना अत्यंत कठिन और जोखिमपूर्ण कार्य है। गांधी केवल एक राजनीतिक नेता नहीं थे; वे एक नैतिक प्रयोग थे। उन्होंने अपने जीवन को सार्वजनिक सत्य की प्रयोगशाला बना दिया था। उन्होंने व्यक्तिगत सुखों का त्याग किया, जेलें भरीं, उपवास किए, सांप्रदायिक हिंसा के बीच शांति स्थापित करने का प्रयास किया और अंततः अपने प्राण भी राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिए। उनके लिए विरोधी भी शत्रु नहीं थे। वे अंग्रेज़ों से लड़ते थे, लेकिन अंग्रेज़ों के प्रति घृणा नहीं फैलाते थे। वे असहमति को लोकतंत्र की शक्ति मानते थे।
राहुल गांधी अभी उस कसौटी से बहुत दूर हैं। उनके भाषणों में तीखे हमले भी होते हैं, व्यंग्य भी होता है, राजनीतिक आक्रोश भी दिखाई देता है। भाजपा उन पर आरोप लगाती है कि वे लोकतांत्रिक जनादेश का सम्मान नहीं करते, जबकि कांग्रेस का कहना है कि वे लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की लड़ाई लड़ रहे हैं। सत्य संभवतः इन दोनों के बीच कहीं होगा। लेकिन यह भी सत्य है कि पिछले कुछ वर्षों में राहुल गांधी ने व्यक्तिगत सत्ता की अपेक्षा वैचारिक राजनीति पर अधिक बल दिया है।
यहीं पर सोनिया गांधी का उदाहरण अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। 2004 में जब संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को बहुमत मिला, तब उनके पास प्रधानमंत्री बनने का पूरा अवसर था। वे चाहतीं तो भारत की प्रधानमंत्री बन सकती थीं। लेकिन उन्होंने वह पद स्वीकार नहीं किया और डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया। उस निर्णय की अनेक राजनीतिक व्याख्याएँ की जा सकती हैं, लेकिन यह तथ्य अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने सर्वोच्च कार्यकारी पद को स्वीकार नहीं किया। भारतीय राजनीति में यह घटना आज भी एक असाधारण उदाहरण के रूप में याद की जाती है।
यदि भविष्य में कभी ऐसी परिस्थिति आती है कि राहुल गांधी के सामने प्रधानमंत्री बनने का अवसर हो और वे किसी नैतिक या वैचारिक कारण से उस पद को ठुकरा दें, तो भारतीय राजनीति में उसका प्रभाव अत्यंत गहरा होगा। ऐसा निर्णय उन्हें तुरंत महात्मा नहीं बना देगा, लेकिन यह अवश्य सिद्ध करेगा कि उनके लिए सत्ता अंतिम लक्ष्य नहीं है। इतिहास में कुछ निर्णय व्यक्ति को पद से बड़ा बना देते हैं।
भारतीय जनता पार्टी राहुल गांधी की राजनीति को नाटकीय और अपरिपक्व बताती है। वह कहती है कि देश को गंभीर नेतृत्व चाहिए, भावनात्मक राजनीति नहीं। दूसरी ओर कांग्रेस का दावा है कि राहुल गांधी लोकतंत्र की आत्मा की रक्षा कर रहे हैं। इन दोनों दावों का निर्णय जनता करेगी, लेकिन इतिहास केवल चुनावों से नहीं बनता। इतिहास व्यक्ति के चरित्र, उसके त्याग, उसके धैर्य और उसके नैतिक साहस से भी बनता है।
आज भारत जिस दौर से गुजर रहा है, वहाँ लोकतंत्र की सबसे बड़ी आवश्यकता केवल एक मजबूत सरकार नहीं, बल्कि मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएँ, स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष मीडिया, सक्रिय नागरिक समाज और स्वस्थ विपक्ष भी है। यदि राहुल गांधी अपनी राजनीति को इन मूल्यों के साथ जोड़ते हैं, तो वे भारतीय राजनीति में एक अलग परंपरा के प्रतिनिधि बन सकते हैं। लेकिन इसके लिए उन्हें केवल संघर्ष नहीं, आत्मसंयम भी दिखाना होगा। केवल विरोध नहीं, वैकल्पिक दृष्टि भी प्रस्तुत करनी होगी। केवल आरोप नहीं, नैतिक उदाहरण भी बनना होगा।
महात्मा गांधी बनने का मार्ग किसी उपाधि से नहीं, बल्कि जीवन से होकर गुजरता है। यह मार्ग अत्यंत कठिन है। इसमें लोकप्रियता से अधिक धैर्य चाहिए, सत्ता से अधिक सेवा चाहिए और विजय से अधिक आत्मबल चाहिए। जो व्यक्ति अपने विरोधी के अधिकार की भी रक्षा कर सके, जो असहमति को देशद्रोह न माने, जो आलोचना को लोकतंत्र का अनिवार्य तत्व समझे और जो व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर उठकर राष्ट्र के नैतिक हित को प्राथमिकता दे, वही गांधी के मार्ग पर चलने का दावा कर सकता है।
राहुल गांधी के सामने अभी लंबी यात्रा है। उन्हें अपने राजनीतिक व्यवहार, भाषा, संगठन और नेतृत्व शैली को लगातार उस नैतिक कसौटी पर परखना होगा जिस पर गांधी स्वयं को परखते थे। यदि वे कभी प्रधानमंत्री बनते हैं तो भी उनकी परीक्षा होगी, और यदि वे प्रधानमंत्री पद छोड़ते हैं तो भी उनकी परीक्षा होगी। इतिहास केवल त्याग को नहीं, त्याग के उद्देश्य को भी देखता है।
मुझे लगता है कि राहुल गांधी के भीतर एक खोज चल रही है। वे केवल सत्ता की राजनीति से संतुष्ट नहीं दिखाई देते। वे भारतीय समाज की आत्मा, उसके दर्द, उसकी असमानताओं और उसकी लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को समझने का प्रयास कर रहे हैं। यह प्रयास सफल होगा या नहीं, यह भविष्य बताएगा। लेकिन यदि यह यात्रा उन्हें सत्ता से अधिक सिद्धांतों की ओर ले जाती है, यदि वे व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर उठकर सार्वजनिक नैतिकता को अपना आधार बनाते हैं, यदि वे राजनीति को प्रतिशोध नहीं बल्कि सेवा का माध्यम बना पाते हैं, तो संभव है कि इतिहास उन्हें एक अलग दृष्टि से देखे।
उन्हें आज महात्मा कहना जल्दबाज़ी होगी। महात्मा की उपाधि इतिहास देता है, समर्थक नहीं। लेकिन यह कहना अनुचित नहीं होगा कि यदि राहुल गांधी गांधी के वास्तविक मूल्यों—सत्य, अहिंसा, प्रेम, संवाद, संवैधानिकता, सादगी और त्याग—को अपने जीवन और राजनीति में उतारने में सफल होते हैं, तो वे भारतीय राजनीति में एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित हो सकते हैं जिसकी पहचान केवल एक दल के नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक नैतिक राजनीतिक परंपरा के वाहक के रूप में होगी।
हो सकता है कि वे कभी प्रधानमंत्री पद को भी ठुकरा दें, जैसा सोनिया गांधी ने किया था। हो सकता है कि वे ऐसा न करें। लेकिन उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वे सत्ता मिलने पर भी सत्ता के मोह से मुक्त रह पाएँगे। यदि इसका उत्तर हाँ में हुआ, तभी उनकी यात्रा वास्तव में गांधी की दिशा में मानी जाएगी।
इतिहास का सबसे बड़ा सम्मान पद नहीं, बल्कि नैतिक विश्वास होता है। और जो नेता जनता के मन में नैतिक विश्वास स्थापित कर देता है, वही समय के साथ व्यक्ति से विचार और विचार से परंपरा बन जाता है। शायद राहुल गांधी की वास्तविक परीक्षा अभी शुरू हुई है, और शायद भविष्य यह तय करेगा कि वे केवल राहुल गांधी रहे, या भारतीय राजनीति ने उनमें किसी बड़े नैतिक परिवर्तन की संभावना देखी थी।










