व्यंग्य -राजेन्द्र सिंह जादौन
देश में दिमागी नक्सल तेजी से फैल रहा है। ऐसा हमारे प्रधान जी ने कल लाल किले की प्राचीर से देश को बताया है। प्रधान जी ने बताया है तो निश्चित ही कोई गंभीर बात होगी, क्योंकि आजकल देश में बहुत-सी ऐसी बातें हैं जिनका पता जनता को बाद में और प्रधान जी को पहले चल जाता है। इसलिए हमने सोचा कि आखिर ये दिमागी नक्सल हैं कौन? इनके कुछ उदाहरण खोजे जाएं, ताकि देश की जनता भी इन्हें पहचान सके।
वैसे दिमागी नक्सल की कोई सरकारी परिभाषा अभी तक सामने नहीं आई है। इसलिए इसका अर्थ भी शायद परिस्थितियों के हिसाब से बदलता रहता है। जो सरकार के पक्ष में हो वह राष्ट्रवादी हो सकता है और जो सरकार से सवाल पूछ दे, वह दिमागी नक्सल बनने की कतार में खड़ा दिखाई दे सकता है। लेकिन अगर प्रधान जी ने कहा है कि दिमागी नक्सल देश के लिए खतरा हैं तो हमें भी उनकी पहचान करने में सहयोग करना चाहिए।
सबसे पहला उदाहरण उस टीवी वाली पाठशाला की शिक्षक का है जिसे ‘शिक्षा’ लिखना नहीं आता, लेकिन वह दर्शक बच्चों को शिक्षा देने की जिम्मेदारी संभाल रही है। बेचारा बच्चा अगर शिक्षक से पूछ बैठे कि गुरुजी शिक्षा कैसे लिखते हैं तो गुरुजी शायद कह दें कि पहले राष्ट्रवाद पढ़ो, वर्तनी बाद में देखेंगे। देश में शिक्षा की हालत पर सवाल उठाने वालों को अक्सर बताया जाता है कि हमारे यहां विश्वस्तरीय शिक्षा व्यवस्था है। अब अगर विश्वस्तरीय शिक्षा में ‘शिक्षा’ ही गलत लिखी जाए तो समझिए दिमागी नक्सल की जड़ें कितनी गहरी हैं।
दूसरा उदाहरण उन महानुभावों का है जिन्हें लगता है कि भारत को आजादी वर्ष 2014 में मिली थी। इतिहास बेचारा कोने में बैठकर अपने पन्ने पलटता रहता है और सोचता है कि मैंने 1947 क्यों लिखा था। स्वतंत्रता सेनानी सोचते होंगे कि हमने अंग्रेजों से लड़ाई क्यों लड़ी, शायद हमें भी 2014 तक इंतजार करना चाहिए था। लेकिन इतिहास का क्या है, उसे तो जब चाहो नए संस्करण में छापा जा सकता है।
ऐसे दिमागी नक्सल संसद में भी दिखाई देते हैं। कुछ के ऊपर आपराधिक मुकदमे हैं, कुछ पर महिलाओं से जुड़े गंभीर आरोप हैं और कुछ ऐसे बयान देते हैं कि लोकतंत्र भी शर्म से अपना चेहरा ढक ले। लेकिन चुनाव जीतने के बाद वही व्यक्ति माननीय हो जाता है। जनता से वोट मांगते समय उसके पुराने कारनामे शायद ‘व्यक्तिगत मामला’ होते हैं और संसद पहुंचते ही वह राष्ट्र निर्माण का ठेकेदार बन जाता है। यही तो दिमागी नक्सल की असली ताकत है दिमाग में विचार कम और सुविधा के हिसाब से सिद्धांत ज्यादा।
दिमागी नक्सल का एक और उदाहरण वह है जो महिला सैनिकों की बहादुरी का अपमान करता है। सीमा पर खड़ी महिला सैनिक गोली और गोलाबारी का सामना कर सकती है, लेकिन देश में बैठे कुछ महानुभावों को उसकी क्षमता पर टिप्पणी करने में देर नहीं लगती। जब महिला सेना में जाती है तो राष्ट्र गौरवान्वित होता है, लेकिन जब वही महिला अपने अधिकारों की बात करती है तो कुछ लोगों की राष्ट्रभक्ति अचानक छुट्टी पर चली जाती है।
फिर वे दिमागी नक्सल हैं जो देश के युवाओं को कॉकरोच समझते हैं। जिस युवा के कंधों पर देश का भविष्य रखा गया है, उसे अगर कोई कीड़ा समझे तो समस्या सिर्फ उस बयान में नहीं, उस सोच में है। युवा नौकरी मांगता है तो उसे धैर्य रखने की सलाह मिलती है। परीक्षा देता है तो पेपर लीक हो जाता है। नौकरी के लिए वर्षों तैयारी करता है तो उम्र निकल जाती है। फिर वही युवा अगर सवाल पूछ ले तो कहा जाता है कि आजकल के बच्चे बहुत अधीर हैं।
दिमागी नक्सल वह भी है जो किसान की परेशानी को सिर्फ आंकड़ा समझता है। किसान खेत में पसीना बहाता है, मौसम से लड़ता है, बाजार से लड़ता है, कर्ज से लड़ता है और कभी-कभी सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते-लगाते अपनी उम्मीद से भी लड़ने लगता है। लेकिन भाषणों में किसान हमेशा खुशहाल रहता है। उसके खेत में समृद्धि होती है और मंच पर उसके नाम की जय-जयकार। बस किसान खुद कहीं दिखाई नहीं देता।
दिमागी नक्सल वह है जो महंगाई पर सवाल पूछने पर अर्थव्यवस्था का पूरा ज्ञान बांटने लगता है। पेट्रोल महंगा हो, गैस महंगी हो, दाल महंगी हो, सब्जी महंगी हो लेकिन सवाल पूछो तो जवाब मिलता है कि देश दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। अब घर की रसोई में अर्थव्यवस्था की विकास दर से सब्जी बनती है या रुपये से, यह सवाल शायद दिमागी नक्सल ही पूछ सकता है।
और दिमागी नक्सल की सबसे शानदार श्रेणी वह है जो कहता है “शुद्ध पेट्रोल तुम्हारे बाप के यहां से आएगा?” अब सवाल यह है कि पेट्रोल जनता के बाप के यहां से आए या सरकार के बाप के यहां से, जनता को तो पंप पर पैसे देकर ही लेना पड़ता है। इसलिए जनता अगर पेट्रोल की कीमत पूछती है तो उसे जवाब चाहिए, गाली नहीं।
दिमागी नक्सल वह भी है जिसे हर समस्या का समाधान केवल भाषण में दिखाई देता है। बेरोजगारी है तो भाषण, महंगाई है तो भाषण, किसान परेशान है तो भाषण, शिक्षा कमजोर है तो भाषण, अस्पताल में डॉक्टर नहीं है तो भाषण। देश में समस्या जितनी बड़ी होती जाती है, भाषण उतना ही लंबा होता जाता है। लगता है किसी दिन अस्पताल में दवा की जगह भाषण और स्कूल में किताब की जगह नारा बांट दिया जाएगा।
दिमागी नक्सल वह है जो हर सवाल को षड्यंत्र मानता है। पत्रकार सवाल पूछे तो विपक्ष का एजेंट, छात्र सवाल पूछे तो टुकड़े-टुकड़े गैंग, किसान सवाल पूछे तो विदेशी ताकतों का आदमी और नागरिक सवाल पूछे तो देशविरोधी। यानी लोकतंत्र में नागरिक का सबसे बड़ा अपराध शायद यही रह गया है कि वह सवाल पूछता है।
दिमागी नक्सल वह है जो सोशल मीडिया पर हर बात को बिना जांचे सच मान लेता है। किसी ने व्हाट्सऐप पर संदेश भेज दिया तो वह इतिहास बन गया, किसी ने वीडियो बना दिया तो वह विज्ञान बन गया और किसी ने मंच से बोल दिया तो वह संविधान बन गया। तथ्य बेचारा दरवाजे पर खड़ा रहता है और पूछता है “अंदर आने की अनुमति है?” जवाब आता है “पहले हमारी विचारधारा से प्रमाणपत्र लेकर आओ।”
दिमागी नक्सल वह भी है जो भगवान को राजनीति में और राजनीति को भगवान के दरबार में ले आता है। भगवान को भक्त चाहिए, वोट बैंक नहीं। लेकिन हमारे यहां भगवान भी चुनावी मौसम में पोस्टर पर आ जाते हैं और नेता जी भी कभी-कभी स्वयं को भगवान का विशेष प्रतिनिधि समझने लगते हैं। अगर कोई नेता खुद को भगवान समझने लगे और जनता से सवाल पूछने का अधिकार भी छीन ले तो फिर दिमागी नक्सल और अंधभक्ति के बीच की दूरी बहुत छोटी रह जाती है।
दिमागी नक्सल वह है जो चेहरा बदलकर विचार बदलने का दावा करता है। आज कुछ कहता है, कल उसका उल्टा कहता है और परसों कहता है कि मैंने ऐसा कभी कहा ही नहीं। जनता वीडियो दिखाती है तो जवाब आता है वीडियो पुराना है। बयान पुराना है तो कहा जाता है संदर्भ अलग था। संदर्भ दिखाओ तो कहा जाता है यह विपक्ष की साजिश है।
ऐसे ढेरों उदाहरण हैं दिमागी नक्सल के। फर्क सिर्फ इतना है कि दिमागी नक्सल जंगल में नहीं रहता, वह हमारे आसपास रहता है। कभी मंच पर दिखाई देता है, कभी संसद में, कभी सोशल मीडिया पर, कभी टीवी की बहस में और कभी हमारे अपने दिमाग में।
इसलिए अगर प्रधान जी सचमुच दिमागी नक्सल को साफ करना चाहते हैं तो सफाई अभियान बहुत बड़ा होना चाहिए। शुरुआत शिक्षा से हो, इतिहास से हो, राजनीति से हो, मीडिया से हो और सबसे पहले उस दिमाग से हो जो सवाल से डरता है। जिस दिन देश का नागरिक बिना डर के सवाल पूछ सकेगा, जिस दिन सरकार बिना नाराज हुए जवाब देगी, जिस दिन नेता आलोचना को दुश्मनी नहीं समझेंगे और जिस दिन शिक्षा का मतलब सिर्फ डिग्री नहीं बल्कि सोचने की क्षमता होगा, उस दिन शायद दिमागी नक्सल अपने आप कमजोर पड़ जाएगा।
क्योंकि देश को सबसे ज्यादा खतरा उस नागरिक से नहीं है जो सवाल पूछता है। असली खतरा उस दिमाग से है जो सवाल पूछना छोड़ देता है।
प्रधान जी ने दिमागी नक्सल साफ करने की बात कही है। उम्मीद है इस सफाई अभियान में झाड़ू केवल विरोधियों के दिमाग पर नहीं चलेगी, बल्कि सत्ता के गलियारों, संसद की कुर्सियों, टीवी के स्टूडियो और समाज के भीतर बैठे अंधविश्वास, झूठ, कट्टरता और अहंकार पर भी चलेगी।
आखिर लोकतंत्र में सफाई तभी पूरी मानी जाएगी जब सवाल पूछने वाले को नहीं, बल्कि झूठ और पाखंड को बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा।










