—लवप्रीत सिह
एक समय वह भी था जब बच्चों को घर से बाहर खेलने जाने के लिए मना किया जाता था। दिनभर घर से बाहर रहकर खेलने के लिए उन्हें डांट भी पड़ती थी लेकिन अब समय बदल गया है। अब हालात ऐसे हो गए हैं कि बच्चे खेलने के लिए घर से बाहर ही नहीं निकल रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण ऑनलाइन वीडियो गेम और स्मार्टफोन है। वीडियो गेम खेलने वाले स्मार्टफोन सात-आठ हजार रुपये तक में आसानी से मिल रहे हैं। वहीं गूगल प्ले-स्टोर पर मुफ्त मोबाइल गेम भी मिल जाते हैं। दरअसल, ऑनलाइन वीडियो गेमिंग का बाजार बहुत ही तेजी से बढ़ रहा है इसी के साथ बढ़ रहा है इसका दुष्परिणाम। कई वीडियो गेम्स बच्चों के लिए बेहद ही खतरनाक साबित हो रहे हैं। ब्लू व्हेल जैसे गेम्स की वजह से कई मौतें भी हो चुकी हैं। आइए जानते हैं कुछ वीडियो गेम्स के बारे में जो बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हैं, उन्हें हिंसक बना रहे हैं और यहां तक की जान देने के लिए भी उकसा रहे हैं।
ऑनलाइन गेम से पनप रहे जानलेवा खतरों को लेकर दुनियाभर में चिंता जताई जा रही है। ऑनलाइन गेम की लत के शिकार बच्चों को बचाने के लिए कई देश इस समय अलर्ट मोड पर हैं। ब्राजील, चीन, वेनेजुएला, जापान और ऑस्ट्रेलिया में ऐसे गेम्स पर प्रतिबंध है, जो हिंसक प्रवृत्ति पैदा करते हैं। चीन में 18 साल से कम उम्र वालों को शुक्रवार, शनिवार, रविवार या फिर सार्वजनिक छुट्टी के दिन सुबह 8 से रात 9 बजे के बीच अधिकतम 3 घंटे तक ही ऑनलाइन गेम की अनुमति है। सख्त नियमों के बावजूद ब्राजील के एक किशोर ने ऑनलाइन चैलेंज पूरा करने के लिए खुद को बटरफ्लाई फ्लूड का इंजेक्शन लगा लिया, जिससे उसकी मौत हो गई। पिछले महीने लखनऊ में एक बीडीएस छात्र ने आत्महत्या का खौफनाक कदम उठाने से पहले अपने दोस्तों को ऑनलाइन गेम खेलने के लिए नोटिफिकेशन भेजा था। वहीं, लखनऊ के दूसरे मामले में ऑनलाइन गेम की लत के शिकार दसवीं के छात्र ने मोबाइल गेम में नुकसान के बाद आत्महत्या कर ली। घर में छोटे बच्चे हैं, तो फिर आपने भी गौर किया होगा कि वे जल्द ही मोबाइल चलाने में एक्सपर्ट हो जाते हैं। जब तक पैरेंट्स बच्चों को मोबाइल न दे, तब तक यह संभव भी नहीं है। कहीं न कहीं इसकी शुरुआत अभिभावक ही करते हैं। लेकिन जब एक बार बच्चों को मोबाइल की लत लग जाती है, तो फिर मोबाइल फोन न देने पर गुस्सा करना, रोना, चीखना और चिल्लाना आम बात हो जाती है। बच्चों को बिजी रखने के लिए खुद ही अभिभावक फोन पर गेम्स और वीडियो चलाकर दे देते हैं। हालांकि शौकिया तौर पर कुछ देर गेम खेलने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब यह शौक एक बुरी लत में बदल जाता है, जिसे गेमिंग की लत या फिर गेमिंग डिसआर्डर भी कहते हैं। गूगल प्ले स्टोर और एपल के एप स्टोर पर कई गेम एप्स मौजूद हैं, जो आसानी से डाउनलोड के लिए उपलब्ध हैं। कई बार इसे शौकिया खेलने के लिए डाउनलोड करते हैं, लेकिन यह बहुत जल्दी लत में तब्दील हो जाती है। आनलाइन या वीडियो गेम की लत नशे से भी बुरी है। खासकर पबजी जैसे गेम बच्चों को हिंसक भी बना रहे हैं। गेमिंग की लत को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बीमारी यानी गेमिंग डिसआर्डर के रूप में चिन्हित किया है। खासकर बढ़ते बच्चों में गेमिंग की लत उनके आगे बढ़ने में बहुत बड़ी बाधा है। गेमिंग के दौरान अलग-अलग लेवल पार करना बच्चे अपनी उपलब्धि मानते हैं। ऐसे में बिना सोचे-समझे वह गेम खेलते चला जाता है। एक्साइटमेंट के लिए वह कुछ भी कर गुजरने से हिचकता नहीं है। यह खेल मानसिक रूप से भी कमजोर बनाता है। खिलाड़ी असल दुनिया से दूर एक वर्चुअल यानी आभासी दुनिया में होता है। कई बार तो गेम में जीतने पर रिवार्ड की सुविधा भी होती है। देखा जाए, तो यह एक तरह से बच्चों को उकसाने का तरीका ही है।
ऑनलाइन गेम चैलेंज को लेकर बच्चों से जुड़ीं ये तो कुछ ही घटनाएं हैं। इससे पहले भी ब्लू वेल चैलेंज, द पास आउट चैलेंज, द सॉल्ट एंड आइस चैलेंज, द फायर चैलेंज और द कटिंग चैलेंज जैसे ऑनलाइन गेम दुनियाभर में हजारों बच्चों की जान ले चुके हैं। ब्लू वेल चैलेंज से दुनियाभर में 130 लोग और द पास आउट चैलेंज में एक हजार बच्चों की मौत खुद अपना गला दबाने या साथी का गला दबाने से हो चुकी है। द सॉल्ट एंड आइस चैलेंज खेलते समय तमाम बच्चे इसलिए अपंग हो गए क्योंकि उन्होंने अपने पैर माइनस 25 डिग्री बर्फ में 15 मिनट तक रखे थे। इसी तहर द फायर चैलेंज में बच्चे अपने शरीर पर ज्वलनशील पदार्थ डालकर आग लगाते हैं और द कटिंग चैलेंज में अपने शरीर में घाव कर टास्क पूरा करने के लिए वीडियो अपलोड करते हैं।
यदि बच्चे की दिनचर्या में बदलाव नजर आए। उसका पूरा कामकाज पबजी के इर्द-गिर्द ही दिखाई देने लगे तो समझिए वह इस खेल की गिरफ्त में जा रहा है। उसका स्वभाव आक्रामक और गुस्सैल हो सकता है। पबजी खेलने से रोकने पर वह हिंसक हो उठता है या गाली-गलौज भी कर सकता है। इस खेल की लत में आया बच्चा आमतौर पर गुमसुम दिखाई देता है। उसकी याददाश्त में कमी आना, बात बिगड़ने के संकेत हैं। मनोचिकित्सकों के अनुसार बच्चों के मां-बाप इस आदत पर लगाम लगाने में खुद को असहाय पा रहे हैं। यह सिर्फ खर्च की बात नहीं है, बल्कि बच्चों के दिमाग पर जो इस खेल का असर हो रहा है, वह आगे जाकर जानलेवा हो सकता है। यदि पैरेंट्स इसे सामान्य मान रहे हैं, तो ये उनकी भूल है।
आपत्तिजनक व हिंसक कंटेंट के कारण 15 देश अलग-अलग तरह के ऑनलाइन गेम्स पर पाबंदी लगा चुके हैं। वेनेजुएला 2009 में ही वीडियो गेम्स बनाने, बेचने और इस्तेमाल करने पर रोक लगा चुका है। ब्राजील बहुत ज्यादा हिंसा वाले गेम बंद किए। चीन 18 साल से कम उम्र वालों को सुबह 8 से रात 9 बजे के बीच शुक्रवार, शनिवार, रविवार और सार्वजनिक छुट्टी के दिन अधिकतम 3 घंटे तक ही ऑनलाइन गेम खेलने की इजाजत है। ऑस्ट्रेलिया में हिंसक, आपत्तिजनक व विवादित कंटेंट वाले ऑनलाइन गेम्स की अनुमति नहीं है। जापान, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, जर्मनी, ब्रिटेन, सऊदी अरब, यूएई, ईरान और पाकिस्तान भी कई पाबंदियां लगा चुके हैं। वहीं, भारत अभी तक ऑनलाइन गेम्स को लेकर कोई सख्त कानून नहीं बना पाया है। हालांकि, भारत पबजी जैसे कई चाइनीज ऑनलाइन गेम्स पर दो साल पहले ही पाबंदी लगा चुका है, लेकिन अब भी ये गेम उपलब्ध हो रहे हैं।
मोबाइल गेम्स की लत से बच्चों और किशोरों, यहां तक कि वयस्कों में हिंसक प्रवृत्ति बढ़ रही है। कुछ मामलाें में माेबाइल लेने से बच्चे डीप डिप्रेशन में चले जाते हैं। इसे टेक्नाेलाॅजी एडिक्शन कह सकते हैं। जाे बच्चे गन वायलेंस वाले वीडियो गेम खेलते हैं, उनमें गन पकड़ने और ट्रिगर दबाने की ज्यादा इच्छा होती है। रिसर्च के बाद यह नतीजे सामने आये हैं। तमाम अध्ययन बताते हैं कि 80 फीसदी बच्चों में ऑनलाइन चैलेंज जीतने का लालच उन्हें आपराधिक प्रवृत्ति का बना रहा है।
यह जरूरी है कि अभिभावक, बच्चों के लिए मोबाइल के इस्तेमाल को सीमित कर दें। ऐसा इसलिए भी कि अधिक समय पर मोबाइल पर व्यस्त रहने वाले बच्चों में ऑनलाइन गेम की लत लगने की आशंका ज्यादा रहती है। ऑनलाइन गेम चैलेंज पूरा करने के लिए बच्चों के घर छोडऩे तथा गेम में फेल होने पर आत्महत्या के मामले भी सामने आ चुके हैं। भारत सरकार ने ऑनलाइन गेमिंग को नियंत्रित करने के लिए 'ऑनलाइन गेमिंग संवर्धन और विनियमन अधिनियम, 2025' (The Promotion and Regulation of Online Gaming Act, 2025) लागू किया है। संसद द्वारा अगस्त 2025 में पारित होने के बाद इसके नियम 1 मई 2026 से पूरे देश में प्रभावी हो चुके हैं। इस कानून का मुख्य उद्देश्य नागरिकों को ऑनलाइन सट्टेबाजी और पैसों के नुकसान से बचाना है।










