स्वतंत्र पत्रकार लवप्रीत सिंह
सहारनपुर कलेक्ट्रेट (डीएम ऑफिस) परिसर स्थित मस्जिद को शनिवार, 5 सितंबर 2026 की सुबह प्रशासन द्वारा गिराया गया। एक मस्जिद पर चला बुलडोजर सिर्फ ईंट-पत्थर की इमारत को गिराने की घटना नहीं है, बल्कि यह देश के लोकतांत्रिक मूल्यों, कानूनी प्रक्रियाओं और सामाजिक सौहार्द पर एक गहरा आघात है। पिछले कुछ वर्षों से उत्तर प्रदेश में 'बुलडोजर न्याय' को जिस प्रकार एक प्रशासनिक मॉडल के रूप में पेश किया जा रहा है, वह कानून के शासन की मूल आत्मा को ही कटघरे में खड़ा करता है।
प्रशासन का दावा होता है कि यह कार्रवाई अवैध निर्माण या अतिक्रमण को हटाने के उद्देश्य से की गई है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या किसी भी निर्माण को अवैध घोषित करने और उस पर रातों-रात बुलडोजर चला देने की प्रक्रिया में निष्पक्षता का पालन किया जा रहा है? जब वर्षों पुराने धार्मिक स्थलों को एक ही झटके में ध्वस्त कर दिया जाता है, तो यह केवल प्रशासनिक तत्परता नहीं बल्कि एकतरफा और पूर्वग्रही सोच की बू देती है।
भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार और सम्मानपूर्वक जीवन जीने की गारंटी देता है। कानून में किसी भी निर्माण के अवैध होने पर एक तय कानूनी प्रक्रिया का प्रावधान है—नोटिस देना, पक्ष सुनने का अवसर देना और अपील के लिए पर्याप्त समय देना। परंतु सहारनपुर की घटना यह दर्शाती है कि प्रशासनिक एजेंसियां स्वयं ही अदालत, जज और जल्लाद की भूमिका निभाने लगी हैं। न्याय की इस नई और मनमानी परिभाषा ने आम नागरिकों में असुरक्षा और खौफ का माहौल पैदा कर दिया है।
सरकार की इस मंशा पर इसलिए भी सवाल खड़े होते हैं क्योंकि 'अतिक्रमण' के नाम पर चुनिंदा और लक्षित कार्रवाइयां देखने को मिलती हैं। यदि वास्तव में कानून व्यवस्था और शहर नियोजन ही प्राथमिकता है, तो फिर नियम हर धर्म और वर्ग के निर्माण पर समान रूप से लागू क्यों नहीं होते? जब एक विशिष्ट समुदाय के धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया जाता है, तो यह संदेश जाता है कि राज्य तंत्र निष्पक्ष रहने के बजाय किसी विशेष राजनीतिक एजेंडे को साधने का काम कर रहा है।
इस प्रकार की दंडात्मक कार्रवाइयों के सामाजिक दुष्परिणाम अत्यंत गंभीर होते हैं। सहारनपुर जैसे क्षेत्र, जो अपनी गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी भाईचारे के लिए जाने जाते हैं, वहां ऐसी घटनाएं नफरत और विभाजन की खाई को और गहरा करती हैं। जब किसी समुदाय के आस्था के केंद्र को बिना उचित सुनवाई के ध्वस्त किया जाता है, तो यह उस पूरे समाज के भीतर अलगाव और असंतोष की भावना को जन्म देता है।
एक कल्याणकारी राज्य का कर्तव्य अपने नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना और समाज में न्याय की स्थापना करना होता है। लेकिन जब सरकार स्वयं न्याय की स्थापित व्यवस्था को दरकिनार कर बुलडोजर संस्कृति को बढ़ावा देने लगे, तो यह लोकतंत्र के कमजोर होने का संकेत है। उच्चतम न्यायालय ने भी समय-समय पर इस तरह की मनमानी कार्रवाइयों पर सख्त टिप्पणियां की हैं और कानून के दायरे में रहकर काम करने की चेतावनी दी है।
सहारनपुर में हुई यह कार्रवाई यह स्पष्ट करती है कि सरकार को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने की सख्त जरूरत है। देश को बुलडोजर के खौफ से नहीं, बल्कि संविधान और कानून की निष्पक्षता से चलाने की आवश्यकता है। जब तक हर नागरिक को यह भरोसा नहीं मिलेगा कि उसके साथ बिना किसी भेदभाव के न्याय होगा, तब तक लोकतंत्र का ढांचा सुरक्षित नहीं रह सकता।










