स्वतंत्र पत्रकार — लवप्रीत सिंह
आज प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुआ टकराव लोकतंत्र के दो अहम पहलुओं को आमने-सामने ले आया। एक तरफ जहाँ अपनी माँगों को लेकर सड़क पर उतरे लोगों का गुस्सा और असंतोष था, वहीं दूसरी तरफ कानून-व्यवस्था बनाए रखने की पुलिस की चुनौती।
जैसे-जैसे भीड़ का दबाव बढ़ा, संवाद की गुंजाइश कम होती गई और तनातनी हिंसा में बदल गई। वॉटर कैनन, आँसू गैस के गोले और पुलिस के कड़े रुख के जवाब में प्रदर्शनकारियों की ओर से भी तीखा विरोध देखने को मिला।
इस झड़प ने एक बार फिर यह कड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि अपनी आवाज उठाने का लोकतांत्रिक अधिकार और सामाजिक शांति के बीच का संतुलन आखिर कहाँ खो जाता है। किसी भी समस्या का समाधान लाठियों या पत्थरबाजी में नहीं, बल्कि मेज पर बैठकर होने वाली सार्थक बातचीत में ही छिपा होता है।भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। लोकतंत्र की इस पहचान की मुख्य दो बुनावटें हैं—पहला, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया, और दूसरा, नागरिकों को अपनी असहमति और विरोध प्रकट करने का संवैधानिक अधिकार। जब ये दोनों ही पहलू किसी एक ही बिंदु पर टकराने लगें, तो वह स्थिति किसी भी जीवंत लोकतंत्र के लिए गहन चिंतन का विषय बन जाती है। हाल के दिनों में राजधानी दिल्ली में निर्वाचन आयोग (इलेक्शन कमीशन) के समक्ष प्रदर्शन कर रहे नागरिकों और प्रदर्शनकारियों के साथ दिल्ली पुलिस का जो रवैया देखने को मिला है, उसने लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक मर्यादाओं पर कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
संविधान का अनुच्छेद 19(1)(b) देश के प्रत्येक नागरिक को बिना हथियारों के शांतिपूर्वक एकत्र होने और विरोध प्रदर्शन करने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। लोकतंत्र में प्रशासनिक और संवैधानिक संस्थाओं से सवाल पूछना जनता का अधिकार है, न कि कोई अपराध। लेकिन दिल्ली के सड़कों से सामने आ रही तस्वीरें और रिपोर्टें एक अलग ही कहानी बयां करती हैं। निर्वाचन आयोग जैसी स्वायत्त और शीर्ष संस्था के बाहर अपनी मांगों और चिंताओं को लेकर शांतिपूर्ण ढंग से आवाज उठा रहे प्रदर्शनकारियों पर जिस प्रकार बल प्रयोग किया गया, उन्हें हिरासत में लिया गया और उनके साथ बदसलूकी की गई, उसे किसी भी दृष्टिकोण से न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।
पुलिस प्रशासन का प्राथमिक दायित्व कानून-व्यवस्था बनाए रखना और सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। हालांकि, हालिया घटनाओं में पुलिस का रवैया एक निष्पक्ष सुरक्षा बल के बजाय दमनकारी संस्था जैसा प्रतीत होता है। सड़कों पर प्रदर्शनकारियों को खदेड़ना, जबरन गाड़ियों में भरना और उनकी आवाज को दबाने का प्रयास करना प्रशासनिक निरंकुशता का परिचायक है। सवाल यह उठता है कि क्या लोकतांत्रिक देश में सवाल पूछना इतना बड़ा गुनाह हो गया है कि उसके जवाब में संवाद के बजाय लाठियां और पुलिसिया कार्रवाई का सामना करना पड़े?
निर्वाचन आयोग देश की एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है, जिसकी साख और निष्पक्षता पर पूरे देश का चुनाव ढांचा टिका होता है। यदि जनता या किसी वर्ग को चुनाव प्रक्रिया या आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर कोई आपत्ति या संदेह है, तो लोकतांत्रिक मर्यादा यह कहती है कि आयोग को आगे आकर उनकी बात सुननी चाहिए और संदेह दूर करने का प्रयास करना चाहिए। इसके विपरीत, प्रदर्शनकारियों की आवाज़ को आयोग के दरवाज़े तक पहुँचने से पहले ही पुलिसिया बल के ज़रिए दबा देना संस्थागत संवादहीनता को दर्शाता है। जब संवैधानिक संस्थाएं जनता से संवाद का मार्ग बंद कर देती हैं, तो असंतोष का गहराना स्वाभाविक है।
प्रशासनिक स्तर पर अक्सर सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का हवाला देकर ऐसे कड़े कदमों को सही ठहराने की कोशिश की जाती है। बेशक, किसी भी प्रदर्शन में शांति बनाए रखना आवश्यक है, लेकिन ‘सुरक्षा’ की आड़ में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करना और अतिरंजित बल प्रयोग करना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं हो सकता। पुलिस बल का उपयोग व्यवस्था बनाए रखने के लिए होना चाहिए, न कि असहमति की आवाज़ को हमेशा के लिए खामोश करने के लिए। प्रदर्शनकारियों के साथ किया गया यह कठोर व्यवहार यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या प्रशासन का उद्देश्य सिर्फ व्यवस्था संभालना है या डर का माहौल पैदा करना?
इस पूरे घटनाक्रम का एक और चिंताजनक पहलू यह है कि जब भी ऐसी घटनाएं होती हैं, तो प्रशासनिक जवाबदेही लगभग शून्य नज़र आती है। प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग करने वाले अधिकारियों या इस तरह के कड़े निर्देश देने वाले तंत्र की कोई स्पष्ट जवाबदेही तय नहीं होती। इस प्रकार का रवैया प्रशासन में तानाशाही की प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है, जहाँ आम नागरिक खुद को असहाय महसूस करने लगता है।
लोकतंत्र केवल पाँच साल में एक बार वोट डालने तक सीमित नहीं है। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जिसमें नागरिक, सरकार और संवैधानिक संस्थाएँ एक-दूसरे के प्रति जवाबदेह होते हैं। यदि देश की राजधानी में ही नागरिकों को अपनी बात रखने के लिए पुलिसिया प्रताड़ना का सामना करना पड़े, तो यह संदेश देश के बाकी हिस्सों के लिए अत्यंत निराशाजनक है। निष्पक्ष संस्थाओं की गरिमा पुलिस की लाठियों से नहीं, बल्कि पारदर्शिता, संवाद और जनता के विश्वास से बहाल होती है।
अब समय आ गया है कि गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस का उच्च नेतृत्व इस रवैये पर आत्ममंथन करे। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के प्रति अपनाए जा रहे इस आक्रामक रवैये को तुरंत रोका जाना चाहिए और दमनकारी नीतियों के स्थान पर लोकतांत्रिक संवाद का रास्ता अपनाया जाना चाहिए। निष्पक्ष जांच के जरिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ड्यूटी के नाम पर अत्यधिक बल प्रयोग करने वाले दोषियों पर कार्रवाई हो। लोकतंत्र की असली ताकत उसकी सहनशीलता और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा में निहित है; दमन और तानाशाही रवैये में नहीं।लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस और नागरिकों के बीच भरोसा सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। पुलिस का मूल ध्येय ही समाज में कानून व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ आम जनमानस में सुरक्षा और विश्वास की भावना पैदा करना होता है।
प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच संतुलन और सहयोग क्यों आवश्यक है संवैधानिक अधिकार: शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का लोकतांत्रिक अधिकार है। जब तक प्रदर्शन हिंसक या गैर-कानूनी न हो, पुलिस का प्राथमिक कार्य उसे सही ढंग से संचालित करवाना और सुरक्षा देना होता है।










