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पानी से तबाही अकाल की दस्तक या इतिहास की पुनरावृत्ति

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पानी से तबाही अकाल की दस्तक या इतिहास की पुनरावृत्ति

रामकृपाल शर्मा 

छतरपुर//  मानसूनी वर्षा ने पिछले अनेक वर्षो का रिकार्ड तोड़ दिया अमूमन जून जुलाई का महीना खरीफ सीजन की बोवनी का महीना मना जाता है किन्तु इस मानसूनी सीजन मे हुई अनवरत वर्षा से अन्नदाता फसलों  की बोवनी ही नही कर सका जो वोया गया वह नष्ट हो गया ।जिले मे अधिकाशं वर्षा का कोटा पूरा हो चुका है । किसान पानी का अकाल मानकर अपने तकदीर को दोषी ठहरा रहा है।बड़ामलहरा क्षेत्र का किसान  इससे अधिक आशंकित है कि  कहीं पानी के अकाल के चलते पैतालीस वर्ष पूर्व सूखा की वजह से जो हालत बने थे उसकी कही पुनरावृति  अधिक पानी से ना हो ।


                   अन्नदाता की आय का प्रमुख आधार खरीफ सीजन की फसल होती है क्योंकि इसमें लागत कम एवं उत्पादन अधिक होता है जिससे रवि सीजन की फसल की लागत पूरी हो जाती है रवि सीजन से जो आय होती है उससे अन्य खर्चो की पूर्ति होती है किसान इस बात से अधिक चिंतित है कि आखिर रवि सीजन की बोवनी कैसे होगी।पानी से उत्पन्न अकाल की स्थिति के चलते जहां पलायन का दौर शुरू हो चुका है वही अपराधों के ग्राफ मे भी बृद्धि हो रही है ।

            उल्लेखनीय है कि सन् 1979--80 के दौरान भयंकर सूखा पड़ा था जुलाई माह मे मानसूनी वर्षा होने के चलते फसल तो बोई गई किन्तु बाद मे वर्षा ना होने के चलते फसलें नष्ट होने के साथ भयंकर अकाल पड़ने से अपराधिक प्रवृति के लोगो ने लूटपाट का राष्ता अख्तियार कर लिया जिसके चलते जिले मे एक दर्जन डकैत गिरोह पनप उठे जिनमें चितर सिह,सौबरन सिंह, सूरज,मथुरा,भैयन गुरु, गब्बर सिंह आदि गिरोहों के आतंक के चलते एक वार फिर बुन्देलखण्ड की वादियां काप उठी लूटपाट से लोग सहम उठे ।सूखे से उत्पन्न हालात तो एक वर्ष मे समाप्त हो गये किन्तु डकैती समस्या को समाप्त होने मे पांच वर्ष से अधिक का समय लग गया ।

अस्सी के दशक से प्रारंभ हुआ था पलायन का सिलसिला *

       अस्सी के दशक मे सूखे के हालातों के चलते किसान खेतिहर मजदूरों ने रोजगार की तलाश मे पहली बार महानगरों की ओर रुख किया ।इसके पूर्व लोग काम की तलाश मे महानगरों को पलायन नहीं करते थे ।यह बात अलग है कि सूखे की स्थिति के चलते "का वर्षा जब कृषि सूखानी" की तर्ज पर राहत कार्य प्रारंभ किये गये किन्तु तब तक पचास फीसदी से अधिक पलायन हो चुका था ।गरीब तबके के लोगों ने जहां काम की तलाश मे पलायन किया वहीं उस दौर मे बड़ती डकैती समस्या लूटपाट से त्रस्त होकर गांव मे आर्थिक रुप से सम्पन्न लोगों ने शहरों एवं कस्बों मे पलायन कर अपना आशियाना बना लिया जिसके चलते शहरों एवं कस्बों की जनसंख्या का अनुपात बड़ गया एवं गांव वीरान हो गये ।डकैतों के उस दौर मे बताया जाता है कि सूरज लोधी सबसे दुर्दान्त डकैत था जिसके सर पर खून का इतना नशा सवार था कि अगर उसे इंसान नहीं मिलता तो वह पालतू जानवरों की गोली मारकर हत्या कर देता था जिसका अन्त किशुनगढ़ क्षेत्र के जंगलों मे पुलिस मुटभेड़ मे हुआ था ।अधिकाशं अन्य डकैत भी पुलिस मुठभेड़ मे मारे गये ।

                       कहते है कि इतिहास की पुनरावृत्ति होती है वर्तमान परिवेश मे कुछ इस तरह की स्थितियां निर्मित हो रही है ।लगातार हो रही बारिश के चलते नब्बे फीसदी खेत खाली पड़े है । रोजगार की तलाश मे पलायन का सिलसिला शुरू हो चुका है ।गांव मे अपराधों का ग्राफ बढ़ने लगा है जो अच्छे सकेत नही ।अगर समय रहते प्रशासन सजग नही हुआ तो परिणाम खतरनाक सावित हो सकते है ।

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