डॉक्टर सैयद खालिद कैस एडवोकेट
लेखक समीक्षक आलोचक पत्रकार
इन दिनों भारत में पड़ोसी देश बंगलादेश में हुई मॉब लिंचिंग के कारण खासा गदर देखने में आ रहा है। चारों तरफ से उस घटना का विरोध हो रहा है। निसंदेह दुनिया में कहीं भी मानवता पर यदि हमले होते हैं तो उसका विरोध, उसकी निंदा होना स्वाभाविक है। हमारे देश की सरकार की भी बंगलादेश में घटित इन घटनाओं पर विपक्षी दलों या पूर्ववर्ती सरकारों को कोसने के बजाय कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है। मॉब लिंचिंग की घटनाएं मानवता विरोधी मानसिकता का परिचय देती हैं। किसी भी सभ्यता, संस्कृति में इसको उचित नहीं ठहराया गया। वर्तमान संदर्भ में भी चाहे विदेश में हो या देश में मॉब लिंचिंग को कभी भी उचित नहीं कहा जा सकता।इसी बीच ओडिशा के संबलपुर ज़िले में 24 दिसंबर को एक प्रवासी मज़दूर की मॉब लिंचिंग हुई. इस घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल है। मृतक की पहचान 30 साल के जुएल शेख के रूप में हुई है, जो पश्चिम बंगाल का रहने वाला था और संबलपुर में दिहाड़ी मजदूर के तौर पर काम करता था।
भारतीय संदर्भ में देखा जाए तो 2014से वर्तमान समय तक की यदि बात की जाए तो भारत में मॉब लिंचिंग की घटनाओं में एक खास धर्म के लोगों की मौत के आंकड़े काफी चिंताजनक हैं। 2014 से 2025 तक, विभिन्न स्रोतों के अनुसार हमलों और मॉब लिंचिंग की घटनाओं में कई लोग मारे गए हैं। 2014 से 2019 के बीच, हेट क्राइम की घटनाओं में 99 लोग मारे गए और लगभग 703 घायल हुए, जिनमें से अधिकांश मुसलमान थे। वहीं
2020 में दिल्ली दंगों में 36 मुसलमान और 15 हिंदू मारे गए थे।वर्ष 2023 में मुसलमानों के खिलाफ हेट क्राइम में 25 लोग मारे गए थे । 2024 में, हिंदू चरमपंथियों द्वारा मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं में 17 लोग मारे गए, जिनमें 15 मुसलमान थे। 2024 में ही, पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा मुसलमानों की हत्याओं के मामले में 21 मुसलमान मारे गए थे। इन आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में धर्म विशेष के खिलाफ हिंसा और मॉब लिंचिंग की घटनाएं बढ़ रही हैं। यह एक गंभीर मुद्दा है जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
हाल में मॉब लिंचिंग से जुड़ी एक घटना का देश भर मे खासा विरोध देखने को मिला।उत्तर प्रदेश सरकार ने 2015 में मोहम्मद अख्लाक हत्या मामले में शामिल अपराधियों के खिलाफ दर्ज मुकदमा वापस लेने के लिए न्यायालय में याचिका दाखिल की थी।
गौरतलब हो कि उत्तर प्रदेश स्थित नोएडा के दादरी के बिसाहड़ा गांव में 28 सितंबर 2015 को मोहम्मद अखलाक की, भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या की थी। हत्या के आरोप में 18 लोग आरोपी बनाए गए थे,फिलहाल 14 आरोपी जमानत पर बाहर हैं। मामले में अभी विचारण ही चल रहा है और न्यायालय द्वारा निर्णय अभी तक नहीं लिया गया है। ऐसे में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आरोपियों के खिलाफ दर्ज मुकदमा वापस लेने की याचिका प्रस्तुत की थी। नोएडा स्थित सूरजपुर की अदालत ने आरोपियों के खिलाफ दर्ज मुकदमा वापस लेने को लेकर शासन की ओर से दाखिल याचिका को खारिज कर दिया है। उत्तर प्रदेश सरकार का यह कदम मानवता विरोधी मानसिकता का परिचय है।अपराधियों को संरक्षण देना राजधर्म नहीं होता। वहीं उत्तर प्रदेश सरकार का दोहरा चरित्र भी उजागर हो रहा है।
उत्तर प्रदेश के ही शहर बहराइच में भी मॉब लिंचिंग की एक घटना में अदालत से फैसले ने सभी को झकझोर दिया। अख्लाक मामले में आरोपियों को बचाने वाली सरकार बहराइच मामले में फांसी तक की सजा दिलवाने पर अडिग दिखाई दी। राज्यधर्म में धर्म नहीं देखा जाता लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार का नजरिया कुछ ऐसा ही प्रदर्शित हुआ।मालूम हो कि बहराइच जिले के महाराजगंज बाजार में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के दौरान 13 अक्टूबर 2024 को घटना हुई थी। रामगोपाल मिश्रा की हत्या के पीछे का कारण दुर्गा प्रतिमा विसर्जन जुलूस के दौरान डीजे पर गाना बजाने को लेकर विवाद था। इस विवाद ने भीषण संघर्ष का रूप ले लिया । मरने वाला युवक एक धर्म विशेष के घर पर बलपूर्वक चढ़ा और उत्पात मचाया, जिसमें गोली लगने से उसकी मौत हो गई थी। मामला फास्ट ट्रैक कोर्ट में रखा गया और इस मामले में कोर्ट ने फैसला सुनाया है। जिसमें मुख्य आरोपी सरफराज उर्फ रिंकू को फांसी की सजा सुनाई गई है, जबकि उसके पिता अब्दुल हमीद और 8 अन्य आरोपियों को उम्रकैद की सजा दी गई है। कोर्ट के इस फैसले पर देश भर में प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, लेकिन अख्लाक मामले में अभियुक्तों का मामला वापस लेने के प्रयास करने वाली सरकार क्या धर्म देखकर निर्णय लेगी यह विचार निंदनीय है। मॉब लिंचिंग पर सरकारों को कठोर कदम उठाना जरूरी है ताकि देश से हेट स्पीच, हेट क्राइम और मॉब लिंचिंग जैसी जघन्य घटनाओं पर विराम लगे जो मानवता विरोधी मानसिकता का परिचय दें। मॉब लिंचिंग मानवता विरोधी मानसिकता का प्रतीक, इस पर ठोस कदम उठाए जाना चाहिए।