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वर्तमान संदर्भ में एक औद्योगिक घराना निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए घातक:प्रेस क्लब ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स

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रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की रिपोर्ट का प्रेस क्लब ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स ने किया समर्थन

भोपाल। गत दिनों मीडिया पर निगरानी रखने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) ने अपनी एक रिपोर्ट जारी कर आरोप लगाया है कि अडानी समूह 2017 से खोजी पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के ख़िलाफ़ दीर्घकालिक, महंगे और डराने वाले मुक़दमे दायर कर रहा है। संस्था ने इन मामलों को प्रेस की आज़ादी के लिए गंभीर ख़तरा बताया है। रिपोर्ट में कहा गया कि अडानी समूह मुक़दमों के ज़रिये पत्रकारों को 'चुप' करा रहा है।

पत्रकार सुरक्षा एवं कल्याण के लिए प्रतिबद्ध अखिल भारतीय संगठन प्रेस क्लब ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स पंजीकृत के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉक्टर सैयद खालिद कैस एडवोकेट ने एक प्रेस विज्ञप्ति रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ)की रिपोर्ट का समर्थन करते हुए कहा कि 2014के बाद से जिस प्रकार निष्पक्ष पत्रकारिता पर हमलों की बात सामने आ रही है वह इस बात का प्रमाण है कि भारत में निष्पक्ष पत्रकारिता अब सुरक्षित नहीं रही है। इस युग में जिस तरह अडानी समूह ने मीडिया जगत पर अपना प्रभाव बढ़ाया वह किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में सरकार और अडानी समूह की सच्चाई उजागर करने वाले निष्पक्ष पत्रकार सरकार और अडानी समूह के निशाने पर आ गए हैं, नतीजा दोनों ने पत्रकारों को डराने धमकाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। खोजी पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के ख़िलाफ़ दीर्घकालिक, महंगे और डराने वाले मुक़दमे दायर करके प्रताड़ित करने का यह धंधा इन दिनों जोरों पर है।

अडानी समूह ने 2017 से अब तक 15 से अधिक पत्रकारों और मीडिया संगठनों के खिलाफ करीब 10 कानूनी कार्रवाईयां शुरू की हैं, जिनमें सिविल और आपराधिक मानहानि के मुक़दमे शामिल हैं। इनमें रवि नायर, अभिसार शर्मा, रवीश कुमार, परंजॉय गुहा ठाकुरता जैसे पत्रकार शामिल हैं। इन मुक़दमों के ज़रिये कम से कम 15 पत्रकारों के काम को बाधित करने की कोशिश की गई है, जिनमें भारतीय मीडिया के कई प्रतिष्ठित नाम शामिल हैं ।

असहमति और आलोचनात्मक टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट पूर्व में ही स्पष्ट कर चुका है कि भारत एक लोकतांत्रिक गणतंत्र है। इसमें हर नागरिक को संविधान से बोलने, अभिव्यक्त करने, संतोष-असंतोष जताने, सहमति-असहमति जताने के साथ ही आलोचना करने का अधिकार हासिल है और यह मूल अधिकार है।वैध और कानूनी तरीके से असहमति का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत गारंटीकृत अधिकारों का एक अभिन्न हिस्सा है. हर व्यक्ति को दूसरों के असहमति के अधिकार का सम्मान करना चाहिए."।

उन्होंने कहा कि रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) ने अडानी समूह पर पत्रकारों के खिलाफ 'कानूनी युद्ध' छेड़ने का आरोप लगाया है और इन मुक़दमों को प्रेस की आज़ादी के लिए गंभीर खतरा बताया है। आरएसएफ का कहना है कि अडानी समूह ऐसे मुक़दमों का असली मक़सद पत्रकारों को मानसिक और आर्थिक रूप से थकाना है, ताकि कानूनी प्रक्रिया ही सज़ा बन जाए । इस समय भी कम से कम नौ पत्रकार अलग-अलग मामलों में कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।इनमें स्वतंत्र खोजी पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता (सात मामले), अबीर दासगुप्ता (चार मामले) और रवि नायर (दो मामले) शामिल हैं।यह एक चिंताजनक बात है कि एक औद्योगिक घराना भारतीय मीडिया के लिए नासूर बन गया है। 

प्रेस क्लब ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स पंजीकृत के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉक्टर सैयद खालिद कैस एडवोकेट ने कहा कि असहमति और आलोचनात्मक टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट पूर्व में ही स्पष्ट कर चुका है कि भारत एक लोकतांत्रिक गणतंत्र है। इसमें हर नागरिक को संविधान से बोलने, अभिव्यक्त करने, संतोष-असंतोष जताने, सहमति-असहमति जताने के साथ ही आलोचना करने का अधिकार हासिल है और यह मूल अधिकार है। वैध और कानूनी तरीके से असहमति का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत गारंटीकृत अधिकारों का एक अभिन्न हिस्सा है। हर व्यक्ति को दूसरों के असहमति के अधिकार का सम्मान करना चाहिए।" सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वैध और क़ानून सम्मत तरीक़े से असहमति के अधिकार को अनुच्छेद 21 द्वारा गारंटीकृत सम्मानजनक और सार्थक जीवन जीने के अधिकार के एक हिस्से के रूप में माना जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सरकार के फैसले की आलोचना करना नागरिकों का अधिकार है और यह अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत मूल अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि आलोचना उचित तरीके से होनी चाहिए और व्यापक आरोप नहीं लगाए जाने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि न्यायपालिका की आलोचना से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन यह उचित तरीके से होनी चाहिए ।

ऐसे में प्रेस की आजादी पर हमले वाकई चिंताजनक हैं। जब पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को उनके काम के लिए धमकाया जाता है या मुक़दमों का सामना करना पड़ता है, तो यह न सिर्फ उनकी स्वतंत्रता पर हमला है, बल्कि लोकतंत्र की नींव पर भी प्रहार है।

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