भोपाल। मध्यप्रदेश की प्रसिद्ध इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी Dilip Buildcon द्वारा 50 लाख रुपये के कथित चेक क्लोनिंग प्रकरण को लेकर एसटीएफ थाने में प्रारंभिक एफआईआर अज्ञात व्यक्तियों के विरुद्ध दर्ज कराई गई थी। शिकायत में आरोप था कि कंपनी के नाम से फर्जी चेक तैयार कर वित्तीय अनियमितता का प्रयास किया गया।
जांच के दौरान पुलिस ने विकास त्रिपाठी को षड्यंत्रकारी बताते हुए मुख्य आरोपी के रूप में प्रकरण में शामिल किया। हालांकि, न्यायालय में सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों पर गंभीर सवाल खड़े हुए। बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता अर्पित सक्सेना ने विस्तृत जिरह करते हुए जांच की प्रक्रिया, दस्तावेजी प्रमाणों और कथित षड्यंत्र के आधारों में कई महत्वपूर्ण कमियां उजागर कीं।
सुनवाई में यह तथ्य भी सामने आया कि संबंधित चेक बैंकिंग प्रक्रिया में संदेहास्पद पाए जाने के कारण मान्य नहीं किया गया था।
निर्णय सुनाते हुए माननीय न्यायाधीश ने अपने आदेश में स्पष्ट टिप्पणी की कि प्रकरण की पुलिस जांच अत्यंत निम्न स्तर की रही है तथा आवश्यक तकनीकी और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का समुचित संकलन नहीं किया गया। न्यायालय ने कहा कि केवल अनुमान और अधूरी जांच के आधार पर किसी व्यक्ति को मुख्य आरोपी ठहराना विधिसम्मत नहीं है।
निर्णय के पश्चात आरोपी के अधिवक्ता अर्पित सक्सेना ने कहा कि उनके मुवक्किल को झूठे प्रकरण में फंसाया गया, जिससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को गंभीर क्षति पहुँची है। उन्होंने संकेत दिया कि इस संबंध में एसटीएफ पुलिस के विरुद्ध क्षतिपूर्ति (डैमेजेस) एवं मानहानि का वाद दायर करने पर भी विचार किया जाएगा।
इन समस्त परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए न्यायालय ने संदेह का लाभ देते हुए विकास त्रिपाठी को आरोपों से बरी कर दिया।










