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सूचना अधिकार अधिनियम को कमजोर करने के उद्देश्य से बनाया गया मोदी सरकार का नए प्राइवेसी कानून खतरनाक

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डॉक्टर सैयद खालिद कैस एडवोकेट 

समीक्षक, आलोचक, पत्रकार 

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कांग्रेस समर्थित यूपीए सरकार द्वारा 2005 में बनाए गए सूचना अधिकार अधिनियम के खिलाफ 2014में सत्ता में आई मोदी सरकार रही है। भ्रष्टाचार को जड़ मूल से खत्म करने का दावा करने वाली सरकार विगत 11साल से भ्रष्टाचार को उजागर करने वालों के खिलाफ प्रथम पंक्ति में नजर आई है। यही कारण है कि देश भर में भाजपा की प्रादेशिक सरकारों ने सूचना अधिकार अधिनियम को कमजोर करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। सूचना अधिकार अधिनियम की आत्मा को नष्ट करने के केंद्र सरकार के एक निर्णय ने यह साबित कर दिया है कि सरकार सूचना अधिकार अधिनियम को नष्ट करके भ्रष्टाचार उजागर होने के सभी प्रयासों पर अंकुश लगाना चाहती है। मौजूदा समय में केंद्र सरकार द्वारा नवंबर 2025में अस्तित्व में आए डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन एक्ट के खिलाफ सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों द्वारा केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल कर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।


गौरतलब हो कि केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन एक्ट की आड़ में सरकार द्वारा RTI कानून में एक लाइन का संशोधन किया गया है, जिसमें “व्यक्तिगत जानकारी” को साझा करने से बाहर कर दिया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के नए प्राइवेसी कानून को लेकर देश में बड़ा कानूनी और लोकतांत्रिक विवाद खड़ा हो गया है। पारदर्शिता के लिए काम करने वाले एक्टिविस्ट्स और पत्रकारों ने इस कानून को सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में यह कहते हुए चुनौती दी है कि इससे पत्रकारिता पर “चिलिंग इफेक्ट” "भयभीत करने वाला प्रभाव" पड़ेगा और सरकार को जनहित की सूचनाएं छिपाने का मौका मिल जाएगा। इस मामले में चार अलग-अलग याचिकाओं पर 23 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है। 


याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह कानून 20 साल पुराने सूचना के अधिकार कानून (RTI) को कमजोर कर रहा है, जो अमेरिका के फ्रीडम ऑफ इंफॉर्मेशन एक्ट की तर्ज पर बना था। केंद्र सरकार ने डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन एक्ट के माध्यम से जहां एक ओर संविधान के अनुच्छेद 19 (1)के तहत प्राप्त विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला किया है वहीं दूसरी ओर इस कानून की आड़ में भ्रष्टाचार को उजागर करने वाली निष्पक्ष पत्रकारिता और एक्टिविस्ट्स के प्रयासों पर अंकुश लगाया है।

दरअसल केंद्र सरकार द्वारा डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन एक्ट के तहत RTI कानून द्वारा चाही गई जानकारी में “व्यक्तिगत जानकारी” को साझा करने से बाहर कर दिया गया है। पहले RTI कानून में यह प्रावधान था कि अगर चाही गई जानकारी की जनहित में जरूरत हो, तो ऐसी जानकारी भी सार्वजनिक की जा सकती है। लेकिन नए कानून के बदलाव के बाद अधिकारियों को यह अधिकार मिल गया है कि वे व्यक्तिगत जानकारी के नाम पर कई अहम सूचनाएं देने से इंकार कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में इस कानून को चुनौती देने वालों का कहना है कि इस बदलाव का इस्तेमाल सरकार ठेकेदारों या अधिकारियों के नाम छिपाने के लिए कर सकती है, भले ही वे घटिया काम या भ्रष्टाचार से जुड़े हों। इससे ओपन गवर्नेंस की अवधारणा कमजोर होगी।

जबकि मीडिया संगठनों का सरकार के इस प्रयास पर कहना है कि इस कानून का असर न्यूज़ गैदरिंग पर पड़ेगा। एडिटर्स 

गिल्ड ऑफ इंडिया ने चेतावनी दी है कि इससे खोजी पत्रकारिता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। यह कानून पत्रकारों और आम नागरिकों को भारी जुर्माने के डर से आत्म-सेंसरशिप के लिए मजबूर करेगा। वहीं दूसरी ओर केंद्र सरकार ने याचिका कर्ताओं के इन आरोपों को खारिज किया है। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैश्य ने संसद में कहा था कि यह बदलाव व्यक्तिगत गोपनीयता और सूचना के अधिकार के बीच संतुलन बनाने के लिए किया गया है और इससे सूचना साझा करने की प्रक्रिया पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा।

केंद्र सरकार द्वारा लगातार निष्पक्ष पत्रकारिता पर बढ़ते हमले और अब इस कानून की आड़ में सरकार द्वारा भ्रष्टाचार उजागर करने वाले निष्पक्ष लोगों पर लगाम कसने के प्रयास से यह साबित हो गया है कि सरकार सूचना अधिकार अधिनियम की मूल भावना को छिन्न-भिन्न करने पर आमादा है। जबकि ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भ्रष्टाचार को उजागर करने में पत्रकारों को छूट दी गई है, लेकिन भारत के इस कानून में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। एक ओर प्रेस स्वतंत्रता को लेकर भारत की स्थिति भी चिंता का विषय बनी हुई है। ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत 180 देशों में 151वें स्थान पर है जो चिंता का विषय है। ऐसे में इस कानून की आड़ में सरकार द्वारा निष्पक्ष पत्रकारिता पर किए यह प्रहार निन्दनीय हैं। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई होगी फैसला भी आयेगा कब आयेगा अभी निश्चित नहीं है, लेकिन इतना साफ है कि यह मामला सिर्फ एक कानून का नहीं, बल्कि पारदर्शिता, पत्रकारिता और लोकतंत्र के भविष्य का बड़ा परीक्षण बन गया है।

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